बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

इलेक्शन लोकल

कुमार राहुल 

ट्रेन में चुनाव की चर्चा छिड़ी, तो मिल गया जवाब...

वोट ले जायेगा और फिर ठन-ठन गोपाल.

आश्विन का प्रथम पक्ष और लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव का भी प्रथम पक्ष. (वोट का पहला चरण) अल सुबह पांच बजने को है. हवा में नमी है. ट्रेन खुल चुकी है. बोगी में लोग ठूंस कर भरे हुए हैं. कोई बच्च रो रहा है, तो कई जवान अपने-अपने मोबाइल पर तेज आवाज में गाना बजा रहे हैं. सभी मोबाइल पर अलग-अलग गीत. कोई यो यो हनी सिंह, तो कोई रफी के तराने सुन रहा है. जो नहीं भी सुनना चाहते हैं, उन्हें भी सुनना पड़ रहा है. यह कोरस चुनाव के इस उत्सवी मौसम में कई अर्थ खोल रहा है. नीतीश कल बांका में सभा कर चुके हैं, पीएम मोदी बांका आने वाले हैं. उसकी भी चर्चा हो रही है.

 हम भी भागलपुर-बांका लोकल ट्रेन में सवार हैं. एक ट्रेन, कई चेहरे, कई विचार.. कुछ विचार जिसे आप सुनना चाहेंगे, बुनना चाहेंगे और लगेगा- अरे ये तो हमने सोचा ही नहीं था.  ट्रेन आगे बढ़ रही है. अलसायी सुबह अब आंख खोलने को बेचैन है. कुछ गाने कम हो गये हैं. अब चुनाव पर भी बातें होने लगी हैं. एक  आदमी जोर से आवाज लगाता है- रामोतार.. हो रामोतार. अब खैनियो पर आफत. धत्त.. न पान तो खैनिये खिलाबो.. पता नहीं ये रामोतार थे या रामअवतार, लेकिन उनके हाथ में खैनी जाते ही चुनाव चर्चा जोर पकड़ने लगी. एक ठिगना जैसा व्यक्ति बोल पड़ा- इस बार क्या खिलेगा. दूसरा बोल पड़ा-खिलेगा नहीं, चलेगा. दे दना दन.. इसके बाद शुरू हुआ पंचम राग में आरोप-प्रत्यारोप. इसने ये नहीं किया, उसने वो नहीं किया. मंदार-मंदार चिल्ला रहे हैं, किसने क्या किया. विक्रमशिला विवि कहां चला गया, वैतलवा फिर आयेगा और इस कंधे पर, उस कंधे पर बैठेगा. सब उसी की भाषा बोलेंगे और लो सब लड्ड गप्प. 

     औसत कद का एक काला व्यक्ति, जो शायद बेलहर का था, बोल पड़ा- पता है, मेरे बेटे ने वोट बहिष्कार करवा दिया, तो उसे नक्सली बना कर ही छोड़ा. हमर बेटा निदरेश छै, लेकिन पुलिस ओकरा जेल में भेजी देलकै..बेटा कहता था, बाबा जेल से निकलबौ, तो असली नक्सली हो जेबौ. वह लगातार बोले जा रहा था. जैसे समय थम-सा गया. हम भी कुछ ठीक से बैठ गये. कान उसकी बातों पर था. रोयें खड़े हो रहे थे. लग रहा था- कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में हम भी दोषी हैं. हम ये भी तो नहीं कह सकते कि हमे माफ कर दो ओ मेरी पीढ़ी कि तुम्हें हम कुछ नहीं दे पाये. हम तो अपने खोल में दुबकने वाले मध्यमवर्गीय मानसिकता वाले ‘ प्राणी’ हैं. उसे सब चाहिए, लेकिन लड़ कर नहीं. वो बेलहर वाला पिता जैसे रोने लगा. उसके कंधे पर कुछ हाथ धीरे से पड़े और उसकी आवाज किसी गीत के सप्तम तान पर जा कर एकाएक विलंबित हो गया. धन्न..ननन.. सब चुप. केवल सन्नाटा बोल रहा है. गाड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही है. चुनाव की बातें पीछे छूट गयी है. बचा है केवल सन्नाटा.

      अचानक एक मोबइल से गाना बजता है- गुड्ड रंगीला टाइप- लूट ले ल’ लूट ले ल’ हो, एके बारे में सब कुछ लूट ले ल’ हो.  मेरे जैसा आदमी भागलपुर स्टेशन के प्रवेश द्वार पर चाय की गुमटी पर बजने वाला गाना ‘दोस्त-दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा और इसे लूट ले ल’ को भी चुनाव के इस मौसम में किसी पार्टी, किसी प्रत्याशी से जोड़ ही लेता है. चांदन के संजय पुजहर शुरू हैं- इस बार भी डैम से पानी बेमौसम बहा है. कई एकड़ फसल बरबाद हुआ है. नदी मर गयी, ताल-तलैया सूख गये. अब खेती भी घाटे का सौदा. पता नहीं सरकार इस पर कुछ करेगी या नहीं.  कोई सरकारी मुलाजिम थे. बोले- वह तो ठीक है, लेकिन वोटवा किसको देना है. अरे यह भी कोई किसी से पूछता है. जिसको मन होगा, उसको देंगे. जो रोजगार देगा, सुरक्षा देगा उसी को देंगे. जवाब मिला-आप चुप रहिए बड़ा बाबू. आप तो एक तारीख हुआ कि नहीं, पैसा उठा लिये. दूसरों से चूल्हा-चौका का हाल पूछिए. माह में पंद्रह दिन ठन-ठन गोपाल. वोट ले जायेगा.फिर सब कुछ ठन-ठन गोपाल..

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