शुक्रवार, 5 मई 2017

जानकीक बहन्ने एकजुट भ' रहल अछि मिथिला

लेखकक नाम माेन नहि पड़ि रहल अछि। कोइ रुसी लेखक रहथि, कहने रहथि जे सीता काल्पनिक पात्र छथि वा वास्तविक, से हमरा नहि बुझल अछि। मुदा सीता दुनियाक सर्वश्रेष्ठ स्त्री पात्र छथि, ऐ मे कोनो संदेह नहि। हिनका जकाँ आर कोनो स्त्री पात्र दुनिया मे नहि भेटत। हम मिथलावासी सीताक दुख सँ तहियो दुखी होइ छलौं आ आइयो भ' रहल छी। तहियो क्रोध अबै छल आ आइयो क्रोध अबैए। मुदा हम सभ अपन क्रोध कें, अपन दुख कें अपनहि धरि रखलौं। सभ दिन इएह सोचैत रहलौं जे ककरा कहबै? के पतियाएत? आ इएह सोचैत-सोचैत एकटा लंबा कालखंड खतम भ' गेलै।
मुदा आब ई दुख हमरा सभ कें बर्दाश्त नहि होइए। प्रश्न अछि त' ओकर जवाब चाही। देश भरि मे रामनवमी मनाओल जाइए मुदा जानकी नवमी किए ने? सीताक बिना रामक कोनो अस्तित्व?  कम सँ कम सीताक प्रति हुनकर व्यवहार 'पुरुषों में उत्तम' बला त' नहि रहनि तहन ओ कोना बनि गेला मर्यादा पुरुषोत्तम? सभ कोइ सिरिफ सीता नहि, सीताक धरतीक तक कें उपेक्षित रखलनि किए? सीता भने आध्यात्मिक पात्र होइथ मुदा हुनकर जे चरित्र छनि से कतहु सँ महज आध्यात्मिक नहि छनि। ओ धर्म सँ ऊपर छथि।
जानकी नवमीक बहन्ने हमरा सभ कें बहुत रास प्रश्नक जवाब चाही। एमहर नीक बात ई भेलए जे हम सभ विभिन्न जगह पर जानकी नवमी मनबै छी, ओइ पर सोचै छी, विचारै छी आ अंदर सेहो देखबाक प्रयत्न करै छी। निश्चित रूप सँ हमरा सभ कें ई पहल मजगूती देत।
जानकी नवमीक बहन्ने हम एत' विभूति आनंदमनोज शांडिल्यक कविता प्रस्तुत क' रहल छी। ई कविता दुनू गोटेक फेसबुक वॉल सँ लेल गेल अछि। संगहि राजा रवि वर्माक ई फोटो सेहो विभूतिजीक फेसबुक वॉल सँ लेल गेल अछि। विभूतिजीक कविता मे जत' सीताक वेदना आहाँकें भेटत ओतै मनोज शांडिल्यक कविता समयक संगे बदलैत चरित्र सँ आहाँ कें अवगत कराओत। विभूतिजीक कविता आहाँकें वेदनाक सागर मे डूबा सकैए मुदा मनोजजीक कविता आहाँकें ऐ सागर सँ निकालत। आहाँ कें वर्तमान सँ अवगत कराएत, समयक बदलैत चरित्र पर कटाक्ष करत, आहाँ कें बिठुआ काटत।
                                                 - सच्चू

हे बहिन सीता 

फोटो - रवि वर्मा।

विभूति आनंद

हे बहीन सीता,
केहन भाग्य ल' क' 
जनमलहुँ,
फेकि देल गेलहुँ 
खेत मे ! 

आइ धरि 
चैन नहि भेटल
छलहुँ मनुष्य, 
बना देल गेलहुँ 
देवता...

अहिंक भाग्य
हमरो सभक संग सटा गेल
परिचिति लेल बौआ रहल छी,
अपनहि मे लड़ैत...

से बेजाय नहि कहलनि
अहाँक ओ कथित
मर्यादापुरुषोत्तम-
'गृहे शूरा...!'

आ अहाँ तँ सहजहिं,
ने ससुरे बास, 
ने नहिरे बास...

तखन,
तखन ककर आस !
तँ,
फाटह हे धरती..

 जानकी 

मनोज शांडिल्य


आब नहि प्रकट होइत छथि जानकी
धरतीक वक्ष सँ
आब जन्म लैत छथि सिया
मायक कोखि सँ
आ ताहू मे
प्राण पर नाना तरहक गिद्ध-दृष्टि रहबाक बादहु
भ्रूण सँ मनुक्ख धारिक यात्रा
पूर्ण कइए लैत छथि आब बेसीभाग

समय बदललैए
आब बनवास होउक कि अज्ञातवास
आकि घरवास वा आवास-प्रवास
नहि खिंचाइत छन्हि श्रीराम बुते
एक पहिया पर गाड़ी
नहि सकि पबैत छथि आब एकसरे

बहुत घूमि चुकल छै कालचक्र
आब इस्कुल-कओलेज मे
क' रहल छथि सीता
सहस्रो दशरथपुत्रक भविष्यक निर्माण
खेत-खरिहान सँ ल' क'
ऑफिस-कचहरी धरि मे
यत्र-तत्र क' रहलि छथि मैथिली
कतेको रघुनंदनक माथ परहक भार हल्लुक

राम-रावणक किरदानी देखि
धरती फटैत छथि आइयो
मुदा ताहि मे पैसैत नहि छथि जानकी
कात सँ निकलि जाइत छथि
अपन साईकल-स्कूटर-मोटर पर
प्रकृतिकेँ ओकर धुरी पर
घुमओबैत रहबाक लेल
सृष्टिकेँ ओकर पटरी पर
चलओबैत रहबाक लेल




बुधवार, 3 मई 2017

सुनिए बांग्ला कवि नजरूल इस्लाम की कविता का हिंदी अनुवाद

video
यहाँ प्रस्तुत काजी नजरूल इस्लाम की अमर कविता विद्रोही का हिंदी अनुवाद एवं पाठ पंकज मित्रा ने किया है। मई में काजी नजरूल इस्लाम की जयंती है।

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

हवा किधर? ओनै आर केनै ....

कुमार राहुल, सुल्तानगंज से लौटकर

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हमारे आगे-आगे सड़क पर एक फटे सर्ट वाले साइकिल चालक के सर्ट के पीछे एक पार्टी का स्टीकर सटा है. उसमें कई वादे लिखे हुए हैं. ठीक उसके सामने से एक रिक्शा आगे बढ़ता है. उस पर पीछे में पेंट से लिखा है- फतेहपुर-2 ...हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है... 

 

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कहते हैं महाकवि विद्यापति अपने अंतिम समय में गंगा के तट पर पहुंच गये और मां गंगा से विनती की- हे मां! जग का कल्याण करो. मुझे मुक्ति दो. बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे, छोड़इत निकट नयन बहु नीरे... सुल्तानगंज की गंगा बोलती है, आपसे बतियाती है. वह उफान पर होती है, तो आपसे बात करती है. वैसे ही यहां की जनता बोलती नहीं, सुन रही है. चुनाव प्रचार अपने उफान पर है. सभी जोर लगा रहे हैं. किसको, किस ओर फिट करें, किस तिकड़म से किसको पटखनी दें. दूसरी तरफ आम जनता है, जो सबको देख रही है, सबका भोंपू झेल रही है, लेकिन चुपचाप. कोई जवाब नहीं देती. गंगा भी तो जवाब नहीं देती? वह तो केवल पाप धोती है. इस मौसम में थोड़ा वैराग्य भाव आ जाना आम जनता के लिए कोई नयी बात नहीं है. यह वही वैराग्य भाव है, जो महाकवि मैथिल कोकिल विद्यापति के हृदय से निकला था- छोड़इत निकट नयन बहु नीरे... उस जनता से बात करें, जो गंगा से बतियाती है, उनकी लहरों से आलोडि़त होती है. गंगा स्थानीय मुद्दा भले ही अन्य जगहों के लिए न हो लेकिन सुल्तानगंज के लिए है. यह गंगा वहां के लोगों को रोटी देती है, पहचान देती है. 

हम भागलपुर से सुल्तानगंज की ओर जा रहे हैं. नाथनगर के बाद धूप में तेजी आती है. नाथनगर चौक पर ही बीच सड़क पर जलजमाव है. सूखे के इस मौसम में सड़क पर पानी ठहरना, वह भी किसी ग्रामीण क्षेत्र के बाजार में, थोड़ा अचरज होता है.  रास्ते में ज्यादातर जुगाड़ गाड़ी ही दिखती है. किसी पर सीमेंट, तो किसी पर खाद्य पदार्थ. लगता है अपना यह प्यारा लोकतंत्र का महापर्व भी किसी जुगाड़ गाड़ी की तरह होता जा रहा है! 

पार्टी नहीं, व्यक्ति पर वोट

बाजार में एक व्यवसायी मिलते हैं. उनका आग्रह होता है कि मेरे एक निकट साथी खड़े हैं. वैसे मैं दूसरी पार्टी का कैडर हूं. मेरा नाम नहीं लिखिये. वैसे आपको बता दूं कि मेरे जैसे कई लोग हैं, जो इस बार पार्टी के बदले व्यक्ति पर वोट देंगे. वे जातीय समीकरण भी बताने लगे, लेकिन उनका मत था कि जाति के बदले व्यक्ति पर ही इस बार वोट पड़ेगा. उनका तर्क था कि कुछ निर्दल उम्मीदवार भी सेंध लगा रहे हैं. ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आता जा रहा है, त्यों-त्यों इनमें से कुछ चेहरे, तो काफी चमकदार होते जा रहे हैं. 

शहर से लगभग 10 किमी दूर के गांव पूरी तरह से चुनावी माहौल में रंग चुके हैं. कई जगह भोंपू बजते दिखे. कई लोगों के सर्ट पर पार्टी का झंडा या श्लोगन, घर के दरवाजे पर स्टीकर देखने को मिले. लोग तास के पत्तों के बीच चुनावी बातें कर रहे थे. फतेहपुर गांव में एक प्रत्याशी को वहां के कुछ लोगों ने घेर लिया था. वे इसे विरोधी की साजिश मान रहे थे. ग्रामीण उनसे नाला बनवाने की मांग पर अड़े हुए थे. इसके साथ ही ग्रामीण प्रतिभाओं के लिए स्टेडियम की भी मांग कर रहे थे. कुछ लोग तो जिला, अनुमंडल आदि मांग भी जोर-शोर से कर रहे थे. पर पता नहीं नेताजी के कान में केवल विरोधी की साजिश ही सुनाई पड़ रही थी. उनका कहना था कि चुनाव में ऐसी बातें विरोधी ही फैलाते हैं. एक कोई ब्रह्मदेव थे. उन्हें कुछ लोग साधु भी कह रहे थे. उनका कहना था कि नाला नहीं दिला सके तो आगे देंगे क्या ? वैसे नेताजी अभी कोई घोषणा भी नहीं कर सकते हैं. आचार संहिता में फंस जायेंगे. लोग यह माने तब न. एक तो पांच साल पर एक बार में धरे-पकड़े जा रहे हैं. ऊपर से आचार संहिता की बात कह हाथ से फिसल रहे हैं. नेताजी के जाते ही लोग हमलोगों के पास आ गये. ग्रामीणों का एक स्वर में कहना था कि वोट उसी को देंगे, जो अपने बीच का होगा. जिसे ‘हौ-रौ’ में अपने दिल की बात कह पायेंगे. बाहर वाला कभी आयेगा भी कि नहीं, पता नहीं. इनमें से एक महिला का मैंने नाम पूछा. उनका जवाब था- साधु जी का नाम छापिये. पता नहीं वह नाम बताने से इतना क्यों घबरा रहीं थीं. बहुत कुरेदने पर कहा- उषा कुमारी. इस नाम में संशय लगा. लग रहा था वह पंचायत के किसी पद पर आशीन हैं. उनके हाथ में मोबाइल और कहने का तरीका से लग रहा था कि यदि वह आगे बढ़ी, तो राजनीति की बड़ी लंबी छलांग लगायेंगी. वे नेताजी के घेराव वाले मामले के डाइमेज कंट्रोल करने की तरह बोल रही थीं- वोट ओकरे देबै, जे अपन बेटा हेतै. बेटा के एक कटोरा दय देबै आ कहबै बेटा भीखो मांगी के पेट पाली ले.  

हवा किधर? ओनै आर केनै... 

हम आगे बढ़ चुके हैं. मुख्य बाजार में टिंकू कुमार की पान दुकान पर खड़े होते हैं. उनसे सवाल दागते हैं. हवा किधर? ओनै आर केनै... नहीं वोट देंगे किस पार्टी को. जिसे देते थे, उसे ही देंगे. वे अपने प्रत्यशी का चयन कर चुके थे. वे अनुभवी को अपना वोट देंगे. वे अपने बीच के लोग को अपना मत देंगे. आगे बढ़ने पर अरविंद कुमार गुप्ता मिले. वे कहते हैं- जनता इतना बेवकूफ है अब कि कह देगी कि किसको वोट देंगे. हां, यहां मुद्दा-उद्दा कुछ नहीं. विकास भी कोई मायने नहीं रखता. पार्टी है, लोकल चेहरा है यही दो बातंे मायने इस बार रखेगी. वोट देना है, तो देना है. महराज! कोई आये-जाये, विकास-तिकास नहीं करता. सब जनता को ठगता है. इस बीच देवेश कुमार चौधरी भी चर्चा में शामिल हो जाते हैं. वे बड़े स्पीड से कई बातें कह जाते हैं. उद्भुत वाक्शक्ति दिखी. कहते हैं- मुद्दा, तो हैं लेकिन प्रत्याशी देख कर ही वोट देंगे. देखिये जब आप मुद्दे की बाते करते हैं, तो यह जान लीजिये. सुल्तानगंज टापू बन गया... एकदम टापू. पूर्वी छोड़ पर चंपानाला, पश्चिमी छोड़ पर घोरघट पुल क्षतिग्रस्त है. बड़े वाहन नहीं आ रहे. व्यवसाय चौपट हो गया है. इसे देखने वाला कोई नहीं है. 

सीढ़ी घाट के नजदीक मिलते हैं कुछ युवा. संजय कुमार यादव, आलोक कुमार, योगेंद्र, सोनू आदि. ये यहीं के रहने वाले हैं. इन्हें चुनावी चर्चा में उतना रस नहीं मिलता. इनमें से कुछ तो वोट देंगे भी तो देख-सुन कर. 

बहरहाल सुल्तानगंज में गंगा की अविरल धारा की तरह अभी चुनावी चर्चा बह रही है. कई बातें हो रही हैं. पर चुनाव के बाद ही पता चलेगा पानी कितना किधर बहा. हम भागलपुर की ओर बढ़ रहे हैं. हमारे आगे-आगे सड़क पर एक फटे सर्ट वाले साइकिल चालक के सर्ट के पीछे एक पार्टी का स्टीकर सटा है. उसमें कई वादे लिखे हुए हैं. ठीक उसके सामने से एक रिक्शा आगे बढ़ता है. उस पर पीछे में पेंट से लिखा है- फतेहपुर-2 ...हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है.

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

इलेक्शन लोकल

कुमार राहुल 

ट्रेन में चुनाव की चर्चा छिड़ी, तो मिल गया जवाब...

वोट ले जायेगा और फिर ठन-ठन गोपाल.

आश्विन का प्रथम पक्ष और लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव का भी प्रथम पक्ष. (वोट का पहला चरण) अल सुबह पांच बजने को है. हवा में नमी है. ट्रेन खुल चुकी है. बोगी में लोग ठूंस कर भरे हुए हैं. कोई बच्च रो रहा है, तो कई जवान अपने-अपने मोबाइल पर तेज आवाज में गाना बजा रहे हैं. सभी मोबाइल पर अलग-अलग गीत. कोई यो यो हनी सिंह, तो कोई रफी के तराने सुन रहा है. जो नहीं भी सुनना चाहते हैं, उन्हें भी सुनना पड़ रहा है. यह कोरस चुनाव के इस उत्सवी मौसम में कई अर्थ खोल रहा है. नीतीश कल बांका में सभा कर चुके हैं, पीएम मोदी बांका आने वाले हैं. उसकी भी चर्चा हो रही है.

 हम भी भागलपुर-बांका लोकल ट्रेन में सवार हैं. एक ट्रेन, कई चेहरे, कई विचार.. कुछ विचार जिसे आप सुनना चाहेंगे, बुनना चाहेंगे और लगेगा- अरे ये तो हमने सोचा ही नहीं था.  ट्रेन आगे बढ़ रही है. अलसायी सुबह अब आंख खोलने को बेचैन है. कुछ गाने कम हो गये हैं. अब चुनाव पर भी बातें होने लगी हैं. एक  आदमी जोर से आवाज लगाता है- रामोतार.. हो रामोतार. अब खैनियो पर आफत. धत्त.. न पान तो खैनिये खिलाबो.. पता नहीं ये रामोतार थे या रामअवतार, लेकिन उनके हाथ में खैनी जाते ही चुनाव चर्चा जोर पकड़ने लगी. एक ठिगना जैसा व्यक्ति बोल पड़ा- इस बार क्या खिलेगा. दूसरा बोल पड़ा-खिलेगा नहीं, चलेगा. दे दना दन.. इसके बाद शुरू हुआ पंचम राग में आरोप-प्रत्यारोप. इसने ये नहीं किया, उसने वो नहीं किया. मंदार-मंदार चिल्ला रहे हैं, किसने क्या किया. विक्रमशिला विवि कहां चला गया, वैतलवा फिर आयेगा और इस कंधे पर, उस कंधे पर बैठेगा. सब उसी की भाषा बोलेंगे और लो सब लड्ड गप्प. 

     औसत कद का एक काला व्यक्ति, जो शायद बेलहर का था, बोल पड़ा- पता है, मेरे बेटे ने वोट बहिष्कार करवा दिया, तो उसे नक्सली बना कर ही छोड़ा. हमर बेटा निदरेश छै, लेकिन पुलिस ओकरा जेल में भेजी देलकै..बेटा कहता था, बाबा जेल से निकलबौ, तो असली नक्सली हो जेबौ. वह लगातार बोले जा रहा था. जैसे समय थम-सा गया. हम भी कुछ ठीक से बैठ गये. कान उसकी बातों पर था. रोयें खड़े हो रहे थे. लग रहा था- कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में हम भी दोषी हैं. हम ये भी तो नहीं कह सकते कि हमे माफ कर दो ओ मेरी पीढ़ी कि तुम्हें हम कुछ नहीं दे पाये. हम तो अपने खोल में दुबकने वाले मध्यमवर्गीय मानसिकता वाले ‘ प्राणी’ हैं. उसे सब चाहिए, लेकिन लड़ कर नहीं. वो बेलहर वाला पिता जैसे रोने लगा. उसके कंधे पर कुछ हाथ धीरे से पड़े और उसकी आवाज किसी गीत के सप्तम तान पर जा कर एकाएक विलंबित हो गया. धन्न..ननन.. सब चुप. केवल सन्नाटा बोल रहा है. गाड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही है. चुनाव की बातें पीछे छूट गयी है. बचा है केवल सन्नाटा.

      अचानक एक मोबइल से गाना बजता है- गुड्ड रंगीला टाइप- लूट ले ल’ लूट ले ल’ हो, एके बारे में सब कुछ लूट ले ल’ हो.  मेरे जैसा आदमी भागलपुर स्टेशन के प्रवेश द्वार पर चाय की गुमटी पर बजने वाला गाना ‘दोस्त-दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा और इसे लूट ले ल’ को भी चुनाव के इस मौसम में किसी पार्टी, किसी प्रत्याशी से जोड़ ही लेता है. चांदन के संजय पुजहर शुरू हैं- इस बार भी डैम से पानी बेमौसम बहा है. कई एकड़ फसल बरबाद हुआ है. नदी मर गयी, ताल-तलैया सूख गये. अब खेती भी घाटे का सौदा. पता नहीं सरकार इस पर कुछ करेगी या नहीं.  कोई सरकारी मुलाजिम थे. बोले- वह तो ठीक है, लेकिन वोटवा किसको देना है. अरे यह भी कोई किसी से पूछता है. जिसको मन होगा, उसको देंगे. जो रोजगार देगा, सुरक्षा देगा उसी को देंगे. जवाब मिला-आप चुप रहिए बड़ा बाबू. आप तो एक तारीख हुआ कि नहीं, पैसा उठा लिये. दूसरों से चूल्हा-चौका का हाल पूछिए. माह में पंद्रह दिन ठन-ठन गोपाल. वोट ले जायेगा.फिर सब कुछ ठन-ठन गोपाल..

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

जेहन में बसे गांव के नाटक

गांव की चौबटिया से 

कुमार राहुल
एक नाटक का रिहर्सल करते बच्चे।

मेरे मन में एक गांव अब भी बसा है, जो गाहे-बगाहे मुङो हंसाता है, रुलाता है. हम चाह कर भी उसे नहीं भूल पाते. मन के किसी कोने में शैतान बच्चे की तरह दुबका, एक आंख से देखता यह गांव दुर्गा पूजा, छठ, होली से गुलजार है. दुर्गा पूजा है, तो नाटक है, होली है, तो नाटक के पात्र हैं. ऐसे पात्र जो गांव को गांव बनाये रखते हैं. मैं पहले दसहरा में होने वाले नाटकों में राजा बन जाता था, तो कभी चोर. कभी डकैत बन जाता था, तो कभी सिपाही. कभी आंदोलन छेड़ कर व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की बात करता था. पर अब मैं कुछ भी नहीं बन पाता. मैं खुद के द्वारा बनाये गये खोल में दुबक गया हूं. पर पता नहीं इस बार बेसब्री से मन में बसा यह छोटा शैतान बच्चे-सा गांव बुला रहा है मुङो. वैसे तो गांव के बारे में आधी-अधूरी जानकारी मिलती रहती है. पता चला है कि जो भौजी बिना घूंघट के घर से बाहर नहीं निकलती थी, वह जनप्रतिनिधि बन गयी है. स्वच्छता अभियान चल रहा है. मुङो गांव में स्वच्छता अभियान चलाने की बात सुनते ही श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी उपन्यास की याद आ जाती है. गांव की पगडंडी से सुबह-शाम चलना मतलब दर्जनों लोगों का सैल्यूट लेना.. मैं देखना चाहता हूं कि स्वच्छता अभियान के बाद क्या यह दृश्य जिंदा है? गरमी में मुङो सीतलपाटी की बरबस याद आ जाती है. वैसे स्वच्छता अभियान और शीतलपाटी की कोई तारतम्यता नहीं है, लेकिन मन है कि दोनों बातें एक साथ याद आ जाती है. पता चला है कि जिस चौर (गीली जमीन वाला क्षेत्र) की कृपा से शीतलपाटी मिल जाया करती थी, वहां से एनएच गुजरने लगा है. बगल में मॉल खुलने की बात भी किसी ने बतायी थी. मॉल खुलने की बात से मुङो रामलगन सब्जी वाले, पाठक काका की सब कुछ एक ही जगह मिलने वाली दुकान, बिजली पान दुकान, पाही वाले का आटा चक्की और कमला पुल से सटे नाचने वाले (नटुआ) मोची की याद आ जाती है. यह भी याद आती है कि कैसे छोटी लाइन की ट्रेन गायब होने लगी और अब इस धंसती हुई पटरी पर बुलेट ट्रेन दौड़ेगी! वैसे तो मन में बसे गांव में एक नदी भी है, जो कभी कल-कल बहती थी, लेकिन मेरे मन की तरह यह नदी भी मरने लगी है. नदी होना एक पूरी सभ्यता का होना/बसना है. पर दूसरे रूप में सोचें तो मन की धारा उस नदी की तरह तो है ही जो बार-बार कमला-कोसी के रूप में निरंतर बहती रहती है और यही निरंतरता मुङो गांव से जोड़े रखती है. वैसे पता चला है कि गांव के किसानों के लिए दिल्ली-पटना ने कई योजनाओं की घोषणा कर दी है. इससे गांव ‘नदिया के पार’ की तरह नहीं ‘दिल वाले दुलहनिया ले जायेंगे’ टाइप हो जायेगा. सरकार ने गांव बदलने के लिए कमर कस ली है. अब पलटू बाबू रोड नहीं, वाया बाइपास गांव पहुंचना होगा. सोचता हूं कि एक बार गांव हो आउं और अंधेर नगरी चौपट राजा नाटक जरूर खेलूं.

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

गुलामों जैसा जीवन जी रहे है बाल श्रमिक

बालक देश या समाज की महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं। बालक आने वाली पीढ़ी के सदस्य है, उनकी समुचित सुरक्षा, लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा व पर्याप्त विकास का दायित्व भी समाज का होता है। यही बच्चे देश के निर्माण में आधार स्तंभ बनते हैं। देश में बाल-कल्याण को प्रमुखता प्रदान करने के लिए देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस को प्रति वर्ष बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि विश्व के कुल बाल श्रमिकों का एक बड़ा भाग भारत में है। कल-कारखाने, गैराज, चाय दुकान सहित अनेक प्रकार के लघु व कुटीर उद्योंगो तथा घरेलू कामों में लगे हुए गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं। बाल श्रमिकों के बारे में कहा जाता है कि ये वे किशोर नहीं हैं  जो दिन के कुछ घंटे खेल और पढ़ाई से निकालकर जेब खर्च के लिए काम करते हैं, बल्कि ये वे मासूम बच्चे हैं जो वयस्कों की जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। दस से अठारह घंटे काम कर कम पैसे में अधिक श्रम बेचते हैं।

गरीबी है मुख्य कारण

बाल श्रमिकों की समस्या के संदर्भ में सरकार की मान्यता है कि इसके मूल में गरीबी है। पर यह पूरी तरह सच नहीं है। सरकार यह मानकर चलती है कि केवल गरीबी के कारण ही लोग अपने बच्चाें को काम करने भेजते हैं। हालांकि समस्या के मूल कारणों में गरीबी से इनकार नहीं किया जा सकता, पर इस विषय पर हुए अनेक अनुसंधानों द्वारा यह तथ्य भी सामने आया है कि इसकी जड़ में गरीबी कम, इलाकों व नियोजकों के निहित स्वार्थ अधिक हैं। वयस्क की तुलना में बाल श्रम सस्ता पड़ता है। यह भी सच है कि बाल श्रमिक धरना प्रदर्शन या हड़ताल जैसे कार्य नहीं करते।

बाल श्रमिकों की दुर्दशा

कहा तो यह जाता है कि बाल्यावस्था स्वर्ग का आनंद प्रदान करती है, पर बाल श्रमिकों के संदर्भ में यह कहना सटीक होगा कि नरक बचपन के आसपास ही है। जानकारी के मुताबिक सैकड़ों बच्चों को रात में सोने के लिए झोपड़ी भी नसीब नही होती। ऐसे कई बच्चे रेलवे स्टेशन, बस स्टाॅप व सार्वजनिक भवनों में रात गुजारते हैं। ऐसे बच्चे अधिकतर ग्रामीण इलाकों से आते हैं।


एनजीओं की होती है महत्वपूर्ण भूमिका

इस समस्या से निपटने के लिए केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नही है। बाल श्रमिकों के कल्याण व मुक्ति के लिए सरकार स्वयं सेवी संगठनों को वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है। बावजूद स्थिति इतनी भयावह क्यों है इस पर मंथन करने की जरूरत है। एक सर्वेक्षण के बाद यह तथ्य उभर कर आया कि कोई भी एनजीओ बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए प्राथमिकता के आधार पर काम नहीं करती। एक-दो एनजीओ है जिनकी प्राथमिकता में यह कार्य शामिल नहीं है। संविधान में 14 वर्ष तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। यदि इस कानून को ही सख्ती से लागू किया जाए तो बाल श्रमिकों की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है। अब तक बाल बाल श्रमिक समस्या को जो प्राथमिकता देनी चाहिए, वह प्रदान नहीं की गई है। उनकी स्थिति सुधारने के लिए जो योजनाएं बनती हैं, वह राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में कागज पर ही रह जाती हैं।

सख्त है कानून

बाल श्रमिकों की रोकथाम के लिए कठोर कानून का प्रावाधान है, बावजूद इस पर लगाम नहीं लगाया जा सका है। जानकारी के अनुसार बाल श्रमिक से काम लेने के जुर्म में कम-से-कम दस हजार के जुर्माना के साथ सजा का भी प्रावधान है।

समाज को होना होगा जागरूक 

इस संबंध में गिरिडीह के श्रम अधीक्षक जनार्दन प्रसाद तांती ने कहा कि बाल श्रम पर रोक के लिए समाज को जागरूक होना होगा। कानून तो इसकी इजाजत नहीं देता और इसके लिए सख्त कानून भी है। पर केवल कानून से काम नहीं चलेगा। ऐसे बाल श्रमिकों का रिकॉर्ड विभाग के पास भी कम ही उपलब्ध होते हैं।

  • अभय वर्मा की रिपोर्ट