शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

धरती बचाने की जद्दोजहद

जलवायु परिवर्तन पर गंभीर नेपाल का मिथिलांचल
 देश में भयानक अकाल पड़ा था. किसान दाने-दाने को मोहताज थे. इंद्रदेव को
तरस नहीं आ रहा था. तब रजा जनक ने परती जमीन में हल चलाया. धरती की कोख से निकली सीता मैया. खूब बारिश हुई और धरती ने ओढ़ ली धानी चुनरिया...
खतरे में सगरमाथा
१५ किमी की यात्रा साइकिल से तय करने के बाद भी ६२ वर्षीय रामप्रवेश यादव के चेहरे पर थकान के कोई भाव नजर नहीं आ रहे थे. नवंबर का महीना था लेकिन धूप में तल्खी थी. रामप्रवेश के माथे पर पसीने की कुछ बूंदें उभर आयी थी, जिसे पोंछकर वे जनकपुर के देवी चौक के छेना मंडल की चाय दुकान में घुसते हैं. वे लोगों को बताते हैं कि नवंबर की धूप में इतनी तल्खी क्यों है. वे लोगों को बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया को निगल जायेगा. और तब इस सुंदर मिथिला और सुंदर नेपाल का क्या होगा. क्या होगा संसार की सबसे ऊँची चोटी सागरमाथा का. इस संकट से दुनिया को उबरना है, तो लोगों को जागरूक होना पड़ेगा.
रामप्रवेश जनकपुर से 15 किमी दूर महिनाथपुर गाँव के रहने वाले हैं. जनकपुर आना-जाना लगा रहता है. महिनाथपुर से जनकपुर आने वाले रामप्रवेश जैसे कई लोग हैं जो आज भी साइकिल या पैदल आते हैं. गाँव से बस, टेम्पो चलते हैं. जयनगर{भारत} से जनकपुर जाने वाली ट्रेन भी गाँव होकर गुजरती है. लेकिन रामप्रवेश कहते हैं कि हम अपपनी आदतें बदल कर जहरिली गैसों के उत्सर्जन को कम कर सकते हैं. अगर हम जल्द ही सावधान नहीं हुए, तो दुनिया को बर्बाद होने से कोई रोक नहीं सकता.
रामप्रवेश जनकपुर के मिथिलांचल विकास परिषद् नामक एक संस्था से जुड़े हुए हैं. मिथिलांचल विकास परिषद् इन दिनों नेपाल में जलवायु परिवर्तन पर कम कर रहा है. रामप्रवेश बताते हैं कि सिर्फ एक-दो संस्था के काम करने से संकट का समाधान नहीं होने वाला है. इसके लिए सबको जागरूक होना पड़ेगा, वर्ना हमारे पापों के कारण दुनिया बर्बाद हो जाएगी. महिनाथपुर के आस-पास के गांवों में इन दिनों बाढ़ व सुखा से निपटने के लिए काफी काम किये जा रहे हैं. सिंचाई के लिए यहां  के ग्रामीणों ने मिथिलांचल विकास परिषद् के सहयोग से कमला नदी से एक नहर निकाली. ग्रामीणों ने इसके लिए श्रमदान किया. मिथिलाचल विकास परिषद् ने इसके लिए लोगों को जागरूक किया. पांच किमी लंबी नहर बनाने के बाद किसानों को सिंचाई का साधन ही नहीं मिला, बल्कि बाढ़ की समस्या का भी कुछ हद तक समाधान मिल गया. नहर बन जाने के बाद अब बाढ़ का पानी गाँव  में जमता नहीं है. ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ का पानी खेतों में जम जाने के कारण फसलें सड़ जाती है. किसानों का काफी नुकसान होता है. यह समस्या इन दस सालों में पैदा हुई है. यहां के लोगों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण या तो बाढ़ की समस्या गहराएगी, या फिर भयानक सूखा पड़ेगा. इसलिए जल को बचाना जरुरी है. 
जनकपुर के आस-पपस के गांवों में इस तरह के कई काम हो रहे हैं. जनकपुर शहर में भी इन दिनों चौक- चौराहों पर लोगों को जागरूक करने वाले बैनर-पोस्टर टंगे हुए मिल जायेंगे.
जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगेन में सम्मलेन होने से पहले सगरमाथा {मौंट एवरेस्ट} के पास कैबिनेट की बैठक कर जलवायु परिवर्तन पर नेपाल अपनी जागरूकता दुनिया भर में प्रगट कर चुका है. इस समय नेपाल का यह प्रयास सचमुच काबिले तारीफ है. जहरिली गैसों का उत्सर्जन करने में अव्वल स्थान रखने वाले मुल्कों को इस बात की फिक्र तक नहीं है लेकिन नेपाल इस मुद्दे पर गंभीर है.  नेपाल इस बात से चकित है कि जहरिली गैसों का उत्सर्जन करने के मामले में उसका स्थान अभी काफी नीचे हैं लेकिन उसके हिमालय पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. झीलें सूखने लगी हैं. राजनीतिक रूप से अस्थिर नेपाल में जो कुछ कल कारखाने थे वो भी बंद हो गए हैं या बंद होने के कगार पर हैं. लेकिन उसका सगरमाथा, जिस पर हर नेपाली नाज करता है, पर संकट मंडराने लगा है. नेपाली इस बात को लेकर अपने पड़ोसी भारत व चीन से भी नाराज हैं. उनका मानना है कि ये दोनों देश समर्थ हैं और जहरिली गैसों का उत्सर्जन करने में अव्वल स्थान रखने वाले देशों से यह कह सकते हैं कि वे इसमें कटौती करे. रामप्रवेश बताते हैं कि अगर हिमालय पगलाया तो इसका खमियाजा सिर्फ नेपाल नहीं भुगतेगा, बल्कि भारत,चीन, भूटान, पाकिस्तान को भी इसका खमियाजा भुगतना पड़ेगा. धरती को बचाने की दिशा में रामप्रवेश जैसे लोगों की ऐसी पहल भले ही नाकाफी हो लेकिन ऐसी पहल से दुनिया भर के लोगों को सिख लेनी चाहिए.       
                                                                         -सच्चिदानंद                                    

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मुक्तिबोध की याद में

 बाबा अपनी पुण्यतिथि पर भुला दिए गए. बाबा को उनके झंडाबरदारों ने भी याद नहीं किया. यह सच है कि पुण्यतिथि व जयंती पर होने वाले आयोजन औपचारिक होते हैं लेकिन ये आयोजन हमें हमरी समृद्ध विरासत से अवगत करते हैं. ये आयोजन हमें बताते हैं कि उन युग पुरुषों ने हमारे लिए और हमारे देश समाज के लिए क्या किया, क्या सोचा. मुक्तिबोध की जयंती १३ नवंबर को है. मुक्तिबोध का जन्म श्यौपुर, ग्वालियर में हुआ. नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया व आजीवन साहित्य-सृजन और पत्रकारिता से जुडे रहे. मुक्तिबोध अपनी लम्बी कविताओं के लिए प्रसिध्द हैं. इनकी कविता में जीवन के प्रति विषाद और आक्रोश है. ये काव्य में नए स्वर के प्रवर्तक तथा मौलिक चिंतक हैं. इन्होंने निबंध, कहानियां तथा समीक्षाएं भी लिखी हैं.
उनकी जयंती पर यहाँ पेश है उनकी लंबी कविता चाँद का मुंह टेढ़ा है.

चाँद का मुंह टेढ़ा है.

नगर के बीचों-बीच
आधी रात--अंधेरे की काली स्याह

शिलाओं से बनी हुई
भीतों और अहातों के, काँच-टुकड़े जमे हुए
ऊँचे-ऊँचे कन्धों पर
चांदनी की फैली हुई सँवलायी झालरें।
कारखाना--अहाते के उस पार
धूम्र मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे
उद्गार--चिह्नाकार--मीनार
मीनारों के बीचों-बीच
चांद का है टेढ़ा मुँह!!
भयानक स्याह सन तिरपन का चांद वह !!
गगन में करफ़्यू है
धरती पर चुपचाप ज़हरीली छिः थूः है !!
पीपल के खाली पड़े घोंसलों में पक्षियों के,
पैठे हैं खाली हुए कारतूस ।
गंजे-सिर चांद की सँवलायी किरनों के जासूस
साम-सूम नगर में धीरे-धीरे घूम-घाम
नगर के कोनों के तिकोनों में छिपे है !!
चांद की कनखियों की कोण-गामी किरनें
पीली-पीली रोशनी की, बिछाती है
अंधेरे में, पट्टियाँ ।
देखती है नगर की ज़िन्दगी का टूटा-फूटा
उदास प्रसार वह ।

समीप विशालकार
अंधियाले लाल पर
सूनेपन की स्याही में डूबी हुई
चांदनी भी सँवलायी हुई है !!

भीमाकार पुलों के बहुत नीचे, भयभीत
मनुष्य-बस्ती के बियाबान तटों पर
बहते हुए पथरीले नालों की धारा में
धराशायी चांदनी के होंठ काले पड़ गये

हरिजन गलियों में
लटकी है पेड़ पर
कुहासे के भूतों की साँवली चूनरी--
चूनरी में अटकी है कंजी आँख गंजे-सिर
टेढ़े-मुँह चांद की ।

बारह का वक़्त है,
भुसभुसे उजाले का फुसफुसाता षड्यन्त्र
शहर में चारों ओर;
ज़माना भी सख्त है !!

अजी, इस मोड़ पर
बरगद की घनघोर शाखाओं की गठियल
अजगरी मेहराब--
मरे हुए ज़मानों की संगठित छायाओं में

बसी हुई
सड़ी-बुसी बास लिये--
फैली है गली के
मुहाने में चुपचाप ।
लोगों के अरे ! आने-जाने में चुपचाप,
अजगरी कमानी से गिरती है टिप-टिप
फड़फड़ाते पक्षियों की बीट--
मानो समय की बीट हो !!
गगन में कर्फ़्यू है,
वृक्षों में बैठे हुए पक्षियों पर करफ़्यू है,
धरती पर किन्तु अजी ! ज़हरीली छिः थूः है ।

बरगद की डाल एक
मुहाने से आगे फैल
सड़क पर बाहरी
लटकती है इस तरह--
मानो कि आदमी के जनम के पहले से
पृथ्वी की छाती पर
जंगली मैमथ की सूँड़ सूँघ रही हो
हवा के लहरीले सिफ़रों को आज भी
बरगद की घनी-घनी छाँव में
फूटी हुई चूड़ियों की सूनी-सूनी कलाई-सी

सूनी-सूनी गलियों में
ग़रीबों के ठाँव में--
चौराहे पर खड़े हुए
भैरों की सिन्दूरी
गेरुई मूरत के पथरीले व्यंग्य स्मित पर
टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी,
तिलिस्मी चांद की राज़-भरी झाइयाँ !!
तजुर्बों का ताबूत
ज़िन्दा यह बरगद
जानता कि भैरों यह कौन है !!
कि भैरों की चट्टानी पीठ पर
पैरों की मज़बूत
पत्थरी-सिन्दूरी ईट पर
भभकते वर्णों के लटकते पोस्टर
ज्वलन्त अक्षर !!

सामने है अंधियाला ताल और
स्याह उसी ताल पर
सँवलायी चांदनी,
समय का घण्टाघर,
निराकार घण्टाघर,
गगन में चुपचाप अनाकार खड़ा है !!
परन्तु, परन्तु...बतलाते
ज़िन्दगी के काँटे ही
कितनी रात बीत गयी

चप्पलों की छपछप,
गली के मुहाने से अजीब-सी आवाज़,
फुसफुसाते हुए शब्द !
जंगल की डालों से गुज़रती हवाओं की सरसर
गली में ज्यों कह जाय
इशारों के आशय,
हवाओं की लहरों के आकार--
किन्हीं ब्रह्मराक्षसों के निराकार
अनाकार
मानो बहस छेड़ दें
बहस जैसे बढ़ जाय
निर्णय पर चली आय
वैसे शब्द बार-बार
गलियों की आत्मा में
बोलते हैं एकाएक
अंधेरे के पेट में से
ज्वालाओं की आँत बाहर निकल आय
वैसे, अरे, शब्दों की धार एक
बिजली के टॉर्च की रोशनी की मार एक
बरगद के खुरदरे अजगरी तने पर
फैल गयी अकस्मात्
बरगद के खुरदरे अजगरी तने पर
फैल गये हाथ दो
मानो ह्रदय में छिपी हुई बातों ने सहसा
अंधेरे से बाहर आ भुजाएँ पसारी हों
फैले गये हाथ दो
चिपका गये पोस्टर
बाँके तिरछे वर्ण और
लाल नीले घनघोर
हड़ताली अक्षर
इन्ही हलचलों के ही कारण तो सहसा
बरगद में पले हुए पंखों की डरी हुई
चौंकी हुई अजीब-सी गन्दी फड़फड़
अंधेरे की आत्मा से करते हुए शिकायत
काँव-काँव करते हुए पक्षियों के जमघट
उड़ने लगे अकस्मात्
मानो अंधेरे के
ह्रदय में सन्देही शंकाओं के पक्षाघात !!
मद्धिम चांदनी में एकाएक एकाएक
खपरैलों पर ठहर गयी
बिल्ली एक चुपचाप
रजनी के निजी गुप्तचरों की प्रतिनिधि
पूँछ उठाये वह
जंगली तेज़
आँख
फैलाये
यमदूत-पुत्री-सी
(सभी देह स्याह, पर
पंजे सिर्फ़ श्वेत और
ख़ून टपकाते हुए नाख़ून)
देखती है मार्जार
चिपकाता कौन है
मकानों की पीठ पर
अहातों की भीत पर
बरगद की अजगरी डालों के फन्दों पर
अंधेरे के कन्धों पर
चिपकाता कौन है ?
चिपकाता कौन है
हड़ताली पोस्टर
बड़े-बड़े अक्षर
बाँके-तिरछे वर्ण और
लम्बे-चौड़े घनघोर
लाल-नीले भयंकर
हड़ताली पोस्टर !!
टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी भी ख़ूब है
मकान-मकान घुस लोहे के गज़ों की जाली
के झरोखों को पार कर
लिपे हुए कमरे में
जेल के कपड़े-सी फैली है चांदनी,
दूर-दूर काली-काली
धारियों के बड़े-बड़े चौखट्टों के मोटे-मोटे
कपड़े-सी फैली है
लेटी है जालीदार झरोखे से आयी हुई
जेल सुझाती हुई ऐयारी रोशनी !!
अंधियाले ताल पर
काले घिने पंखों के बार-बार
चक्करों के मंडराते विस्तार
घिना चिमगादड़-दल भटकता है चारों ओर
मानो अहं के अवरुद्ध
अपावन अशुद्ध घेरे में घिरे हुए
नपुंसक पंखों की छटपटाती रफ़्तार
घिना चिमगादड़-दल
भटकता है प्यासा-सा,
बुद्धि की आँखों में
स्वार्थों के शीशे-सा !!

बरगद को किन्तु सब
पता था इतिहास,
कोलतारी सड़क पर खड़े हुए सर्वोच्च
गान्धी के पुतले पर
बैठे हुए आँखों के दो चक्र
यानी कि घुग्घू एक--
तिलक के पुतले पर
बैठे हुए घुग्घू से
बातचीत करते हुए
कहता ही जाता है--
"......मसान में......
मैंने भी सिद्धि की ।
देखो मूठ मार दी
मनुष्यों पर इस तरह......"
तिलक के पुतले पर बैठे हुए घुग्घू ने
देखा कि भयानक लाल मूँठ
काले आसमान में
तैरती-सी धीरे-धीरे जा रही
उद्गार-चिह्नाकार विकराल
तैरता था लाल-लाल !!
देख, उसने कहा कि वाह-वाह
रात के जहाँपनाह
इसीलिए आज-कल
दिल के उजाले में भी अंधेरे की साख है
रात्रि की काँखों में दबी हुई
संस्कृति-पाखी के पंख है सुरक्षित !!
...पी गया आसमान
रात्रि की अंधियाली सच्चाइयाँ घोंट के,
मनुष्यों को मारने के ख़ूब हैं ये टोटके !
गगन में करफ़्यू है,
ज़माने में ज़ोरदार ज़हरीली छिः थूः है !!
सराफ़े में बिजली के बूदम
खम्भों पर लटके हुए मद्धिम
दिमाग़ में धुन्ध है,
चिन्ता है सट्टे की ह्रदय-विनाशिनी !!
रात्रि की काली स्याह
कड़ाही से अकस्मात्
सड़कों पर फैल गयी
सत्यों की मिठाई की चाशनी !!
टेढ़े-मुँह चांद की ऐयारी रोशनी
भीमाकार पुलों के
ठीक नीचे बैठकर,
चोरों-सी उचक्कों-सी
नालों और झरनों के तटों पर
किनारे-किनारे चल,
पानी पर झुके हुए
पेड़ों के नीचे बैठ,
रात-बे-रात वह
मछलियाँ फँसाती है
आवारा मछुओं-सी शोहदों-सी चांदनी
सड़कों के पिछवाड़े
टूटे-फूटे दृश्यों में,
गन्दगी के काले-से नाले के झाग पर
बदमस्त कल्पना-सी फैली थी रात-भर
सेक्स के कष्टों के कवियों के काम-सी !
किंग्सवे में मशहूर
रात की है ज़िन्दगी !
सड़कों की श्रीमान्
भारतीय फिरंगी दुकान,
सुगन्धित प्रकाश में चमचमाता ईमान
रंगीन चमकती चीज़ों के सुरभित
स्पर्शों में
शीशों की सुविशाल झाँइयों के रमणीय
दृश्यों में
बसी थी चांदनी
खूबसूरत अमरीकी मैग्ज़ीन-पृष्ठों-सी
खुली थी,
नंगी-सी नारियों के
उघरे हुए अंगों के
विभिन्न पोज़ों मे
लेटी थी चांदनी
सफे़द
अण्डरवियर-सी, आधुनिक प्रतीकों में
फैली थी
चांदनी !
करफ़्यू नहीं यहाँ, पसन्दगी...सन्दली,
किंग्सवे में मशहूर रात की है ज़िन्दगी
अजी, यह चांदनी भी बड़ी मसखरी है !!
तिमंज़ले की एक
खिड़की में बिल्ली के सफे़द धब्बे-सी
चमकती हुई वह
समेटकर हाथ-पाँव
किसी की ताक में
बैठी हुई चुपचाप
धीरे से उतरती है
रास्तों पर पथों पर;
चढ़ती है छतों पर
गैलरी में घूम और
खपरैलों पर चढ़कर
नीमों की शाखों के सहारे
आंगन में उतरकर
कमरों में हलके-पाँव
देखती है, खोजती है--
शहर के कोनों के तिकोने में छुपी हुई
चांदनी
सड़क के पेड़ों के गुम्बदों पर चढ़कर
महल उलाँघ कर
मुहल्ले पार कर
गलियों की गुहाओं में दबे-पाँव
खुफ़िया सुराग़ में
गुप्तचरी ताक में
जमी हुई खोजती है कौन वह
कन्धों पर अंधेरे के
चिपकाता कौन है
भड़कीले पोस्टर,
लम्बे-चौड़े वर्ण और
बाँके-तिरछे घनघोर
लाल-नीले अक्षर ।

कोलतारी सड़क के बीचों-बीच खड़ी हुई
गान्धी की मूर्ति पर
बैठे हुए घुग्घू ने
गाना शुरु किया,
हिचकी की ताल पर
साँसों ने तब
मर जाना
शुरु किया,
टेलीफ़ून-खम्भों पर थमे हुए तारों ने
सट्टे के ट्रंक-कॉल-सुरों में
थर्राना और झनझनाना शुरु किया !
रात्रि का काला-स्याह
कन-टोप पहने हुए
आसमान-बाबा ने हनुमान-चालीसा
डूबी हुई बानी में गाना शुरु किया ।
मसान के उजाड़
पेड़ों की अंधियाली शाख पर
लाल-लाल लटके हुए
प्रकाश के चीथड़े--
हिलते हुए, डुलते हुए, लपट के पल्लू ।
सचाई के अध-जले मुर्दों की चिताओं की
फटी हुई, फूटी हुई दहक में कवियों ने
बहकती कविताएँ गाना शुरु किया ।
संस्कृति के कुहरीले धुएँ से भूतों के
गोल-गोल मटकों से चेहरों ने
नम्रता के घिघियाते स्वांग में
दुनिया को हाथ जोड़
कहना शुरु किया--
बुद्ध के स्तूप में
मानव के सपने
गड़ गये, गाड़े गये !!
ईसा के पंख सब
झड़ गये, झाड़े गये !!
सत्य की
देवदासी-चोलियाँ उतारी गयी
उघारी गयीं,
सपनों की आँते सब
चीरी गयीं, फाड़ी गयीं !!
बाक़ी सब खोल है,
ज़िन्दगी में झोल है !!
गलियों का सिन्दूरी विकराल
खड़ा हुआ भैरों, किन्तु,
हँस पड़ा ख़तरनाक
चांदनी के चेहरे पर
गलियों की भूरी ख़ाक
उड़ने लगी धूल और
सँवलायी नंगी हुई चाँदनी !
और, उस अँधियाले ताल के उस पार
नगर निहारता-सा खड़ा है पहाड़ एक
लोहे की नभ-चुम्भी शिला का चबूतरा
लोहांगी कहाता है
कि जिसके भव्य शीर्ष पर
बड़ा भारी खण्डहर
खण्डहर के ध्वंसों में बुज़ुर्ग दरख़्त एक
जिसके घने तने पर
लिक्खी है प्रेमियों ने
अपनी याददाश्तें,
लोहांगी में हवाएँ
दरख़्त में घुसकर
पत्तों से फुसफुसाती कहती हैं
नगर की व्यथाएँ
सभाओं की कथाएँ
मोर्चों की तड़प और
मकानों के मोर्चे
मीटिंगों के मर्म-राग
अंगारों से भरी हुई
प्राणों की गर्म राख
गलियों में बसी हुई छायाओं के लोक में
छायाएँ हिलीं कुछ
छायाएँ चली दो
मद्धिम चांदनी में
भैरों के सिन्दूरी भयावने मुख पर
छायीं दो छायाएँ
छरहरी छाइयाँ !!
रात्रि की थाहों में लिपटी हुई साँवली तहों में
ज़िन्दगी का प्रश्नमयी थरथर

थरथराते बेक़ाबू चांदनी के
पल्ले-सी उड़ती है गगन-कंगूरों पर ।
पीपल के पत्तों के कम्प में
चांदनी के चमकते कम्प से
ज़िन्दगी की अकुलायी थाहों के अंचल
उड़ते हैं हवा में !!

गलियों के आगे बढ़
बगल में लिये कुछ
मोटे-मोटे कागज़ों की घनी-घनी भोंगली
लटकाये हाथ में
डिब्बा एक टीन का
डिब्बे में धरे हुए लम्बी-सी कूँची एक
ज़माना नंगे-पैर
कहता मैं पेण्टर
शहर है साथ-साथ
कहता मैं कारीगर--
बरगद की गोल-गोल
हड्डियों की पत्तेदार
उलझनों के ढाँचों में
लटकाओ पोस्टर,
गलियों के अलमस्त
फ़क़ीरों के लहरदार
गीतों से फहराओ
चिपकाओ पोस्टर
कहता है कारीगर ।
मज़े में आते हुए
पेण्टर ने हँसकर कहा--
पोस्टर लगे हैं,
कि ठीक जगह
तड़के ही मज़दूर
पढ़ेंगे घूर-घूर,
रास्ते में खड़े-खड़े लोग-बाग
पढ़ेंगे ज़िन्दगी की
झल्लायी हुई आग !
प्यारे भाई कारीगर,
अगर खींच सकूँ मैं--
हड़ताली पोस्टर पढ़ते हुए
लोगों के रेखा-चित्र,
बड़ा मज़ा आयेगा ।
कत्थई खपरैलों से उठते हुए धुएँ
रंगों में
आसमानी सियाही मिलायी जाय,
सुबह की किरनों के रंगों में
रात के गृह-दीप-प्रकाश को आशाएँ घोलकर
हिम्मतें लायी जायँ,
स्याहियों से आँखें बने
आँखों की पुतली में धधक की लाल-लाल
पाँख बने,
एकाग्र ध्यान-भरी
आँखों की किरनें
पोस्टरों पर गिरे--तब
कहो भाई कैसा हो ?
कारीगर ने साथी के कन्धे पर हाथ रख
कहा तब--
मेरे भी करतब सुनो तुम,
धुएँ से कजलाये
कोठे की भीत पर
बाँस की तीली की लेखनी से लिखी थी
राम-कथा व्यथा की
कि आज भी जो सत्य है
लेकिन, भाई, कहाँ अब वक़्त है !!
तसवीरें बनाने की
इच्छा अभी बाक़ी है--
ज़िन्दगी भूरी ही नहीं, वह ख़ाकी है ।
ज़माने ने नगर के कन्धे पर हाथ रख
कह दिया साफ़-साफ़
पैरों के नखों से या डण्डे की नोक से
धरती की धूल में भी रेखाएँ खींचकर
तसवीरें बनाती हैं
बशर्ते कि ज़िन्दगी के चित्र-सी
बनाने का चाव हो
श्रद्धा हो, भाव हो ।
कारीगर ने हँसकर
बगल में खींचकर पेण्टर से कहा, भाई
चित्र बनाते वक़्त
सब स्वार्थ त्यागे जायँ,
अंधेरे से भरे हुए
ज़ीने की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती जो
अभिलाषा--अन्ध है
ऊपर के कमरे सब अपने लिए बन्द हैं
अपने लिए नहीं वे !!
ज़माने ने नगर से यह कहा कि
ग़लत है यह, भ्रम है
हमारा अधिकार सम्मिलित श्रम और
छीनने का दम है ।
फ़िलहाल तसवीरें
इस समय हम
नहीं बना पायेंगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे ।
हम धधकायेंगे ।
मानो या मानो मत
आज तो चन्द्र है, सविता है,
पोस्टर ही कविता है !!
वेदना के रक्त से लिखे गये
लाल-लाल घनघोर
धधकते पोस्टर
गलियों के कानों में बोलते हैं
धड़कती छाती की प्यार-भरी गरमी में
भाफ-बने आँसू के ख़ूँख़ार अक्षर !!
चटाख से लगी हुई
रायफ़ली गोली के धड़ाकों से टकरा
प्रतिरोधी अक्षर
ज़माने के पैग़म्बर
टूटता आसमान थामते हैं कन्धों पर
हड़ताली पोस्टर
कहते हैं पोस्टर--
आदमी की दर्द-भरी गहरी पुकार सुन
पड़ता है दौड़ जो
आदमी है वह ख़ूब
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
बूढ़ी माँ के झुर्रीदार
चेहरे पर छाये हुए
आँखों में डूबे हुए
ज़िन्दगी के तजुर्बात
बोलते हैं एक साथ
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
चिल्लाते हैं पोस्टर ।
धरती का नीला पल्ला काँपता है
यानी आसमान काँपता है,
आदमी के ह्रदय में करुणा कि रिमझिम,
काली इस झड़ी में
विचारों की विक्षोभी तडित् कराहती
क्रोध की गुहाओं का मुँह खोले
शक्ति के पहाड़ दहाड़ते
काली इस झड़ी में वेदना की तडित् कराहती
मदद के लिए अब,
करुणा के रोंगटों में सन्नाटा
दौड़ पड़ता आदमी,
व आदमी के दौड़ने के साथ-साथ
दौड़ता जहान
और दौड़ पड़ता आसमान !!

मुहल्ले के मुहाने के उस पार
बहस छिड़ी हुई है,
पोस्टर पहने हुए
बरगद की शाखें ढीठ
पोस्टर धारण किये
भैंरों की कड़ी पीठ
भैंरों और बरगद में बहस खड़ी हुई है
ज़ोरदार जिरह कि कितना समय लगेगा
सुबह होगी कब और
मुश्किल होगी दूर कब
समय का कण-कण
गगन की कालिमा से
बूंद-बूंद चू रहा
तडित्-उजाला बन !!    

बुधवार, 3 नवंबर 2010

बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर विशेष

पांच नवम्बर १९९८ की रात दरभंगा रेडियो से यह सूचना मिली थी कि बाबा नागार्जुन नहीं रहे. तरौनी में उनका अंतिम संस्कार होगा. अब तक कई कवियों के दिवंगत होने की सूचना रेडियो व टीवी से मिली थी लेकिन बाबा ऐसे पहले कवि थे जिनके गुजरने की खबर की चर्चा पूरे गाँव में हो रही थी. अभी कुछ दिन पहले कलम ही पकड़ा था और एक-दो कार्यक्रमों में उनसे भेंट भी हो चुकी थी. ऐसे में उनका अंतिम दर्शन नहीं करने का सवाल ही कहाँ पैदा होता था. मेरे गाँव से तरौनी की दूरी काफी नहीं थी, सो सुबह होते ही तरौनी के लिए निकल पड़ा था. सकरी स्टेशन से तरौनी जाने वाली सड़क पर काफी भीड़ लगी थी. भीड़ देखने से लगता था मानों किसी नेता का आगमन होने वाला हो. पूछने पर पता चला कि ये लोग किसी नेता का नहीं, बल्कि बाबा नागार्जुन का अंतिम दर्शन करने के लिए खड़े थे. किसी कवि का अंतिम दर्शन करने के लिए लोगों की इतनी भीड़ न पहले कभी देखी थी और न ही ऐसा कभी सुना था. यह बाबा का लोक प्रेम ही था कि उनका अंतिम दर्शन करने के लिए उन लोगों का हुजूम भी उमड़ पड़ा था, जिनका साहित्य से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था.
मेरे पास इतने ही पैसे थे कि मैं सकरी से पैटघाट तक बस से जा सकूं. सो, सकरी से तरौनी तक की लगभग चार किमी की यात्रा पैदल ही तय करनी थी. इसका सबसे बड़ा फायदा मुझे यह मिला कि रास्ते में लोगों को बाबा के बारे में बोलते-बतियाते सुना. हैरत की बात यह थी कि बाबा के बारे में वे भी चर्चा कर रहे थे जो निरक्षर थे. सब उस आदमी के अंतिम दर्शन के लिए आतुर थे, जो उनके बीच का था, जो उनके समाज का था. और लगता था कि यहीं कहीं है बाबा का बलचनमा, रतिनाथ की चाची, वरुण के बेटे का वह हर किरदार जो अदम्य जिजीविषा लिए हुए है. मैं आगे-आगे चल रहा था और पीछे एक ट्रक पर आ रहा था बाबा का पार्थिव शरीर. लेकिन मेरी आखों के सामने बाबा जीवित थे. बाबा जीवित थे उन लोगों में, जिनमे बलचनमा व रतिनाथ की चाची जीवित थे. बाबा उन लोगों में जीवित थे जो उनका अंतिम दर्शन करने के लिए व्यग्र थे. बाबा की पुण्यतिथि पांच नवम्बर को है. इस अवसर पर यहाँ पेश है बाबा की वो कविताएं जो समाज को झकझोरती है. उसका अच्छा-बुरा सामने लाती है.
                                                                                                                 -सच्चिदानंद
अग्निबीज
तुमने बोए थे
रमे जूझते,
युग के बहु आयामी
सपनों में, प्रिय
खोए थे !
अग्निबीज
तुमने बोए थे

तब के वे साथी
क्या से क्या हो गए
कर दिया क्या से क्या तो,
देख–देख
प्रतिरूपी छवियाँ
पहले खीझे
फिर रोए थे
अग्निबीज
तुमने बोए थे
ऋषि की दृष्टि
मिली थी सचमुच
भारतीय आत्मा थे तुम तो
लाभ–लोभ की हीन भावना
पास न फटकी
अपनों की यह ओछी नीयत
प्रतिपल ही
काँटों–सी खटकी
स्वेच्छावश तुम
शरशैया पर लेट गए थे
लेकिन उन पतले होठों पर
मुस्कानों की आभा भी तो
कभी–कभी खेला करती थी !
यही फूल की अभिलाषा थी
निश्चय¸ तुम तो
इस 'जन–युग' के
बोधिसत्व थे;
पारमिता में त्याग तत्व थे।
विज्ञापन सुंदरी
रमा लो मांग में सिन्दूरी छलना...
फिर बेटी विज्ञापन लेने निकलना...
तुम्हारी चाची को यह गुर कहाँ था मालूम!

हाथ न हुए पीले
विधि विहित पत्नी किसी की हो न सकीं
चौरंगी के पीछे वो जो होटल है
और उस होटल का
वो जो मुच्छड़ रौबीला बैरा है
ले गया सपने में बार-बार यादवपुर
कैरियर पे लाद के कि आख़िर शादी तो होगी ही
नहीं? मैं झूठ कहता हूँ?
ओ, हे युग नन्दिनी विज्ञापन सुन्दरी,
गलाती है तुम्हारी मुस्कान की मृदु मद्धिम आँच
धन-कुलिश हिय-हम कुबेर के छौनों को
क्या ख़ूब!
क्या ख़ूब
कर लाई सिक्योर विज्ञापन के आर्डर!
क्या कहा?
डेढ़ हज़ार?
अजी, वाह, सत्रह सौ!
सत्रह सौ के विज्ञापन?
आओ, बेटी, आ जाओ, पास बैठो
तफसील में बताओ...
कहाँ-कहाँ जाना पड़ा? कै-कै बार?
क्लाइव रोड?
डलहौजी?
चौरंगी?
ब्रेबोर्न रोड?
बर्बाद हुए तीन रोज़ : पाँच शामें ?
कोई बात नहीं...
कोई बात नहीं...
आओ, आओ, तफ़सील में बतलाओ!
फसल
एक के नहीं,
दो के नहीं,
ढेर सारी नदियों के पानी का जादू:
एक के नहीं,
दो के नहीं,
लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा:
एक के नहीं,
दो के नहीं,
हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म:
फसल क्‍या है?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!

गुलाबी चूड़ियाँ
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
\काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वर्ना किसे नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!
अन्न पचीसी के दोहे
सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बडे ही गूढ़

अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़

कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथ
बन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ

छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट
मिल सकती कैसे भला, अन्नचोर को छूट

आज गहन है भूख का, धुंधला है आकाश
कल अपनी सरकार का होगा पर्दाफ़ाश

नागार्जुन-मुख से कढे साखी के ये बोल
साथी को समझाइये रचना है अनमोल

अन्न-पचीसी मुख्तसर, लग करोड़-करोड़
सचमुच ही लग जाएगी आँख कान में होड़

अन्न्ब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रहम पिशाच
औघड मैथिल नागजी अर्जुन यही उवाच

गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

शरद पूर्णिमा की रात

सच्चिदानंद
अच्छा है कि आज
शहर में नहीं है बिजली
और जवान है शरद पूर्णिमा कि रात
अगर आयेगी बिजली
तो बुझा लो अपनी-अपनी बत्ती
भेज दो बिजली को वहां
जहाँ हो आमावस

आओ,
लिखें एक कविता
ओस से नहाये हुए धन के पौथों के बीच
उसके जूडे में सिंगरहार लगाने की
लेकिन यहाँ नहीं है धनखेत
खुली हुई छत पर पसरी हुई है चांदनी
तो आओ,
इस दूधिया रोशनी में लिखें
चांदनी बचाने की कविता
पसरे हुए सिंगरहार की खुशबू से
मह-मह करते आँगन की कविता
आओ,
इस सिहरन भरी रात में लिखें
कल-कल बहती कोसी-कमला की कविता
खिलखिलाती हुई धरती की कविता

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

माचिस

सच्चिदानंद  
यह माचिस नहीं
कल के लिए आग है
कल, जब भीषण ठंड में
लोटे का पानी
बन जायेगा बर्फ
ठिठुरती हुई रात में
जलेगी माचिस की आग
पिघलेगा बर्फ और
बुझेगी प्यास

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

छेदना के लिए

सच्चिदानंद
 काश, छेदना भी उड़ पाता जहाज पर
काश छेदना भी जा पाता दिल्ली
घूम आता अमरीका से
देख आता आगरे का ताजमहल
लेकिन छेदना के लिए तो गोड्डा भी दूर था
सुसनी  से सुन्दरपहाड़ी जाने में भी होती थी कठिनाई
अपने पैरों का ही भरोसा था- कहीं आने-जाने के लिए

कहते हैं कि छेदना भूख से मर गया
डाक्टर कहते हैं कि वह कुपोषित था
कई बीमारियों की वजह से उसकी मौत हुई

बात जो भी हो \ लेकिन यह सब उस समय हुआ था
जब हमारे देश में
हवाई जहाज में चढ़ने वालों की संख्या में वृद्धि हुई थी
वैश्विक मंदी का दौर भी था
बड़ी-बड़ी कम्पनियों में
भरी संख्या में लोगों की छुट्टी की जा रही थी
लेकिन कार के साथ कलर टीवी मुफ्त में बांटे जा रहे थे
कम्पनी की ओर से ग्राहकों का बिमा कराया जा रहा था
साबुन के साथ साबुन व तेल के साथ शैम्पू
देने का चलन तो पहले ही शुरू हो चुका था

लेकिन छेड़ना के पड़ोसी की मानें तो,
 उसे दो महीने तक अन्न के दर्शन तक नहीं हुए थे
जब छेड़ना ने बिस्तर पकड़ा तो
पड़ोसियों ने उसे दो-चार दिन तक भोजन कराये 
लेकिन वे भी कितना दिन खिला सकते  थे
दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद
इतने पैसे नहीं बचते थे कि अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके
लोग बताते हैं कि छेदना की एक कुपोषित बेटी
भोजन नहीं मिलने के कारण
पहले ही दम तोड़ चुकी थी
डाक्टर इस बात से चकित थे कि
छेदना इतने दिनों तक जिन्दा कैसे रहा
यह सब उस समय हो रहा था
जब चाँद पर जमीन खरीदने की बात हो रही थी
अपने परिवार के साथ फाइव स्टार होटल में
खाना खाने वोले लागों की संख्या में वृद्धि हुई थी

असल में
इन सबके बीच एक गहरी खाई थी
पहले से कहीं ज्यादा गहरी
जो गहरी दिखती नहीं थी.

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

पाकिस्तानी कवयित्री फ़हमीदा रियाज की कविता

पाकिस्तानी कवयित्री फ़हमीदा रियाज की कविता नया भारत दो मुल्कों की एक तस्वीर पेश करती है. इस कविता को  हँस के जुलाई 1999 अंक से साभार लिया गया है.
नया भारत

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

अब तक कहां छुपे थे भाई?
वह मूरखता, वह घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई

भूत धरम का नाच रहा है
कायम हिन्दू राज करोगे?
सारे उल्टे काज करोगे?
अपना चमन नाराज करोगे?

तुम भी बैठे करोगे सोचा,
पूरी है वैसी तैयारी,
कौन है हिन्दू कौन नहीं है
तुम भी करोगे फतवे जारी

वहां भी मुश्किल होगा जीना
दांतो आ जाएगा पसीना
जैसे-तैसे कटा करेगी
वहां भी सबकी सांस घुटेगी

माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नज़र न आयी?

भाड़ में जाये शिक्षा-विक्षा,
अब जाहिलपन के गुन गाना,
आगे गड्ढा है यह मत देखो
वापस लाओ गया जमाना

हम जिन पर रोया करते थे
तुम ने भी वह बात अब की है
बहुत मलाल है हमको, लेकिन
हा हा हा हा हो हो ही ही

कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई

मश्क करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पांवों चलते जाना,
दूजा ध्यान न मन में आए
बस पीछे ही नज़र जमाना

एक जाप-सा करते जाओ,
बारम्बार यह ही दोहराओ
कितना वीर महान था भारत!
कैसा आलीशान था भारत!

फिर तुम लोग पहुंच जाओगे
बस परलोक पहुंच जाओगे!

हम तो हैं पहले से वहां पर,
तुम भी समय निकालते रहना,
अब जिस नरक में जाओ, वहां से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना!

सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

निर्मला पुतुल की संताली कविता

निर्मला पुतुल संताली की चर्चित कवयित्री हैं. उनकी कविताओं में आदिवासियों के संघर्ष और उनकी जिजीविषा की झलक मिलती है.
बाँस
बाँस कहाँ नहीं होता है

जंगल हो या पहाड़
हर जगह दिखता है बाँस

बाँस जो कभी छप्पर में लगता है तो कभी
तम्बू का खूँटा बनता है
कभी बाँसुरी बनता है तो कभी डण्डा
सूप, डलिया हो पंखा
सब में बाँस का उपयोग होता है.

बाँस की ख़ासियत भी अजीब है
जो बिना खाद-पानी के भी बढ़ जाता है
उसकी कोई देखभाल नहीं करनी पड़ती है
बस, जहाँ लगा दो लग जाता है

पर बुजुर्गों का कहना है कि
कुँवारे लड़के-लड़कियों को इसे नहीं लगाना चाहिए
नहीं तो हमेशा बाँझ ही रह जाएंगे.

बाँस जहाँ भी होता है
अपनी ऊँचाई का अहसास कराता है
जहाँ अन्य पेड़ बौने पड़ जाते हैं

बाँस को लेकर कई अवधारणाएँ हैं
आदिवसियों की कुछ और ग़ैरआदिवासियों की कुछ
चूँकि बाँस के सम्बन्ध में आदिवासियों की धारणा
सबसे महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है.

बाँस को लेकर कई मुहावरे हैं
जिसमें एक मुहावरा किसी को बाँस करना है
जो इन दिनों सर्वाधिक चर्चित मुहावरा है

अब इस बाँस करना में कई अर्थ हो सकते हैं
यह आदमी पर निर्भर करता है कि
इसका कौन कैसा अर्थ लेता है.

यदि मैं आपको कहूँ
आपके बाँस कर दूँगी
तो अब आप ही बताएँ कि
इसका क्या अर्थ लेंगे.

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

बाबा नागार्जुन की कविता

१९५२ में लिखी गयी बाबा की कविता अकाल और उसके बाद की प्रासंगिकता अभी ख़त्म नहीं हुई है. भूख से आज भी मौतें होती है. फर्क सिर्फ इतना है कि गरीब व अमीर के बीच की खाई ज्यादा गहरी हो गयी है. ग्लोबलाय लेजेशन के इस युग में एक तबका काफी पीछे छूट गया है. यह हमारे देश की विडंबना ही है  कि यह कविता आज भी प्रासंगिक है. भूख से हुई मौतें अब अख़बारों की सुर्खियाँ नहीं बनती.
अकाल और उसके बाद
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।

रचनाकाल : 1952

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

भवनाथ झा की मैथिली कहानी

                                                             घुरि आउ कमला
एक नगरमे एक राजा रहथि, हुनक यश दूर दूर धरि पसरल छलनि। से सूनि क' आन आन नगरसँ लोक सभ आबि ओतए बसए लागल। राजाक आमदनी बढ़ल गेलनि। ओ पहिनेसँ आर बेसी भोग-विलासमे लागि गेलाह। नवघरिया सभक द्वारा अपन-अपन नगरसँ आनल वस्तुजात सभक उपभोग बढैत गेलनि। पछिमाहा दारू आ दछिनाहा बुलकीवाली सभक चसक लागि गेलनि। आब ओ की तँ शिकार खेलाथि नहि तँ अन्नरक कोठामे जमल रमल रहथि। राज-काजक सभटा भार देवानजी पर छलनि। ओ बड बुधियार रहथि आ मुँहगर लोकसभ सुखी सम्पन्न छल तें नीक जकाँ दिन बितल जाइत रहनि।
मुदा, एक बेर राजमे रौदी भेल। इनार पोखरि सभ सुखा गेलै। पुक्खो रुक्खे चल गेलै; लोक अन्न पानि बेतरेक मरए लागल। राजाकें चाँकि भेलनि। एहि आफदमे लोकक रक्षाले' पोखरि खुनबए लागलाह। राजाक बखारी खुजल। तिनसाला बासमती चाउर, जन कें बोनि भेटए लगलैक। अन्न तँ भेटलै मुदा पानि ले' लोक बेलल्ले रहल। दू चारि रजकूप टा टेक धएने छलैक। बाँकी सभमे चट्टा पडि गेल रहैक। माल-जाल सभ किछु दिन पोखरिक घोर मठार पानि पीलक मुदा बादमे ओहो सुखाए गेलै। चमरखल्ली गन्हाए लागल।
लोक सभकें आस लागल रहै जे पोखरि खुनाएत तँ पानिक सोह फुटतैक। मुदा से नहि भए रहल छलैक। सोह तँ दूर, गिलगर माँटियो नै अभरि रहल छलैक। राजा सभ दिन साँझके अपनहि जा क' देखथि आ निरास भ' घूरि जाथि। लोक सभ बाजए लागल जे कमला माइक कोनो अनठ भेलनि तें रूसि रहलीह। राजाक आढ़ति भेल। सभठाम कमला माइक पूजा हुअए लागल। पाठी कबुला कएल गेल। आन-आन नगर सँ भाँति-भाँतिक धामि सभ बजाओल गेलाह। केओ धानक जुट्टी, तँ केओ डाला भरि पान आ डाला भरि मखान चढ ओलनि, मुदा कोनो फल नहि। एक गोटे कहलनि जे कमला माइक सुखाएल धारमे सोनाक माछ गाड ल जाए।' ई सुनितहि रानी झट द' अपन खोपासँ माछ निकालि धामिक आगाँ राखि देलनि। एहि टोनापर सभक विश्वास रहैक। जन सभ राति क' सपना देखए लागल जे कोदारिक छओ लगितहि पानिक तेहन बमकोला छुटलै जे सभ कोदारि छोडि छोडि भागि रहल अछि। जेना धरती फाटि गेल होइक। लोकक भरोस बढ ल गेलै। दिन बेरागन देखि क' नगरक पुबरिया धारमें एक हाथ गँहीर, एक हाथ नाम आ एक हाथ चाकर खाधि खूनल गेल। ओहिमे राजा अपनहि हाथें माछ गाड लनि। दोसर दिन जन सभ दुन्ना जोश सँ माँटि कोड ए लागल, मुदा सभ व्यर्थ। पोखरि एक बाँस गँहीर भ' गेल रहैक, तैयो माटि ठक ठक करै। राजा बड चिन्तित भेलाह। रातुक निन्न बिलाए गेलनि। कने काल ले' आँखि लागियो जाइन तँ तेहन ने' सपना देखए लागथि जे चेहा क' उठि जाथि।
एही हालमे एक राति राजा सपनामे सुनलनि जे केओ स्त्री हिचुकि हिचुकि क' कानि रहल अछि। राजा चेहा क' उठलाह। सपना सत्त बुझएलनि। भेलनि जे रानी कनैत छथि। मुदा नहि। रानी सूतलि रहथि। तखनि राजाकें छगुन्ता लगलनि। एक बेर इच्छा भेलनि जे रानीकें उठाए दियनि, मुदा फेर सोचलनि जे इहो तँ कइएक राति सँ जगरने कए रहल छथि, तें जँ निन्न भेल छनि तँ थोड ेक काल सुतए दैत छियनि। राजा उठलाह। चारूकात अकानलनि। कानब बंद भ' गेल रहैक। जखनि कोनो भाँज नहि लगलनि तँ फेर सूति रहलाह। थोडे कालमे फेर कानब सुनलनि। एहिना जहाँ ने राजाकें आँखि लागनि कि कानब सुनथि। उठि क' बैसथि की ओ आवाज बिला जाइ। राजा चिन्तित भेलाह। भिनसरे धामि सभकें बजाए कहलथिन। ओ लोकनि टोना-टापरमे लागि गेलाह। कते कँटैल, बङौर आ मरिचाइ आगिमे झोंकल गेल, तकर ठेकान नहि। मुदा सभ व्यर्थ।
एहिना कतोक दिन बीति गेल। एक राति राजा के बुझएलनि जे हुनकर पलङरी लग एकटा स्त्री ठाढ़ि अछि। ओकर एक हाथमे धानक जुट्टी छैक आ दोसरमे भेटक फूल। लाल रङक पटोर पहिरने अछि आ गरदनिमे मखानक फोंकाक माला लटकल छैक। ओएह हिचुकि हिचुकि कानि रहल अछि।
राजा पुछलखिन- ''अहाँ के छी? किए कनै छी।'' ओ बजलीह- ''बाउ! हम अहाँक गोसाउनि थिकहुँ। हमर सखी कमला तमसाए पताल लोक चल गेल छथि। हमरा एसकर मोन नै लगैए तें कोंढ फाटि जाइ-ए।''
राजा दुनू हाथ जोडि हुनका प्रणाम कएल आ पुछल- ''हे माय, कमला माइ किए तमसाएल छथि?''
''अहींक किरदानी सँ'- बजलीह गोसाउनि।
''हमरासँ कोन अपराध भेलनि हे माय!'' राजा अकचकाइन पुछलथिन।
एहि पर गोसाउनि तमसाए कहल- ''सभटा हमरहि मुँहे सुनब? जाउ धारक कछेरमे सिमरक गाछक तर निशाभाग रातिमे एक गोटे भेटत ओ एड ी सँ टिकासन धरि बुझाए देत''। ई कहि गोसाउनि जाए लगलीह। राजा हुनक पयर पकड बा ले धड फड एलाह कि निम्न टूटि गेलनि।

राजा उठि क' बैसि गेलाह। सपनाक सभटा गप्प मोनमे घुरिआए लगलनि। रातुक एगारह बाजल रहैक। ओही राति सपना परतएबा ले' तरुआरि कसि लेलनि। तौनी सँ अपन सौंसे देह झाँपि साधारण लोकक बाना बनाए लेलनि। अनका केकरो नहि संग क' एसकरे कमलाक कछेर दिस विदा भेलाह। हवेली क पछवारी कात छहरदेबारी टूटल रहैक। ओही देने चोर जकाँ हाता सँ बाहर भए गेलाह।
बाहर सौसे भकोभन्न रहैक। ककरो चाल भजार नहि पाबि निश्चिन्त भ' धारक कछेर पहुँचलाह। ओतए एकटा सिमरक गाछ छल। लोक कहल करए जे जहिया कमला माइ एतए बहए लगलीह ओही दिन सँ ई गाछ अछि। ओकर जड़ि ततेक मोट भ' गेल रहय जे चारि गोटे जँ हथ्थाजोडी क' पजियाबए तखनि पओतैक। राजा सिमरक गाछ अंदाजि क' ओत' जएबाक बाट धएलनि। अन्हार मे देखलखिन नहि, ओतए अमती काँटक एकटा झाँङरमे ओझराए गेलाह। तौनी एक दिससँ छोड ाबथि तँ दोसर काँटमे बझि जाइन। एही प्रयास मे लागल रहथि कि तावत कोनो पैघ चिड ै पाँखि फड फड ओलक आ बुझएलनि जेना सिम्मरक गाछपर सँ केओ अथाह पानिमे छप्प सँ कूदल होअए। धार सुखाएल छलै से हिनका बुझले छलनि तें आदंकसँ सर्द भ' गेलाह। एम्हर काँट छुटबे नै कएलनि। गिदरक झुंड सेहो फकसियारी काटए लागल। अंतमे राजा ओहि तौनीकें काँटेपर छोडि अपने मुक्त भ' रोलाह। ओ सिमरक गाछ लगीचेमे रहैक तें घेंघिआइते जकाँ सोर कएलनि- ''सिमर क गाछ तर केओ छह हओ।'' राजाक ई कहितहि एकटा बाझ हिनका दिस झपटल, मुदा माथक ठीक उपर देने दोसर दिस चल गेल। राजा तिलमिलाए गोलाह। पयर थरथराए लगलनि। एतबामे सिमरक गाछ परसँ केओ ठहक्का मारलक आ गरजए लागल- ''आबि गेलह तों। आबहि पड लौक ने।''
राजा कें बुझएलनि जेना केओ डेन पकडि क' धीचि रहल अछि। गाछक जडि मे पहुँचलाह। ओतए एकटा खोपडि छल, जकर मुँहथरिपर एक घैल पानि राखल छलै। खोपडि क भीतर एकटा डिबिया जरि रहल छलै। राजा निहुरि क' देखलनि तँ ओत' केओ नहि रहय। ओ बुझलनि जे जकरा मादे गोसाउनि कहलनि से' कतहु गेल अछि। थोडे कालमे धूरि क' आबि जाएत तखनि ओकरा सँ गप्प करब। राजा ओही खोपडि मे जा क' बैसि गेलाह।
सिमरक गाछ परसँ फेर केओ हँसल। राजा ओहि दिस अकानलनि तँ नजरि गेलनि ओकर एकटा डारि पर, जतए मनुक्खक कंकाल उनटा लटकल छल। ओकर दुनू टा पयर एकटा डारिमे बान्हल रहैक। ओएह हँसि रहल छल।
-''के थिकाह तों, किएक हँसि रहल छह?।'' -पुछलखिन राजा। राजा डेराए गेल रहथि, तैयो अपन कुलदेवीक मंत्र जपैत साहस कएने रहथि।
ओ परेत बाजल- ''दू टा बात एके बेर पुछैत छह मूरख!' पहिने एकटाक उत्तर सुनह। तखनि दोसरक उत्तर कहबहु।''
ओ एक बेर बपहारि कटलक आ बाजल-
''हे राजा, अहाँक पाँचम पुरखाक समयक गप्प थिक। हमर जन्म एकटा मलाहक घरमे भले रहय। हमर बाबा बड़ कलामी रहथि। एक बेर जाल घुमाबथि तँ एक कट्ठा भरि छापि लेथि। एक डूबमे एक धूर मखान बहारि लेथि। आब अछि केओ एहन। केओ नहि; केओ नहि। हमर बापो तेहने। चौरी चाँचरक कमी नै रहै। सभतरि पानिए पानि। उपरमे ओइरी धान आ तरमे खलबल करैत सिंगी माँगुर आ कबै माछ। हमरा माछे भात खाइत मोंछक पमही भेल।
ओही गामक दोसर टोल मे एकटा छौड ी रहै। नाँओ रहै- फुलिया। ओकरा अपन गाममे केओ नै रहै, तें अपन बहिन-बहिनोए लग आबि गेल रहए। ओकरहु चढंतिए छलै। लोक सभ झुट्ठे कहै जे फुलियाक देह इछाइन मँहकै छै। भेटक ढ ेरही तोड ैत काल जखनि ओ डाँड भरि पानिमे चुभकैत हमर लगीच आबए तँ बुझाए जे सौंसे चौरी भेट फुला गेलै-ए। हमहूँ ताकि हेरिक' दू चारि भेटक माला बनाए ओकरा पहिराबए लगियैक कि ओ लाल होइत गाल छिपबैत भागि जाए।'
राजा बिच्चहि मे टोकि देलनि- ''फुलियाक खिस्सा सुनाबए लगलह। ई ने कहह जे तों के थिकह?''
परेत हँसल- ''सत्ते मूरख छह। हओ फुलियाक बिना की हमरा चीन्हि सकबह। सुनह चुपचाप।''
परेत फेर कहए लागल- ''गाममे फुलिया आ हमर बात सभ केओ बूझि गेल रहए। ओकर बहिन सेहो सुनलक। गप्प चललै। फुलिया सँ हमर बियाह भ' गेल। ओही साल कमला माइ सेहो किरपा कएलखिन। एही गाम देने बहए लगलीह। खूब धानो उपजै। माछ मखान भेट, सिंघार, करहर, सारूख ई सभ तँ अलेल रहै। केओ पुछनिहार नहि। ओही सँ लोकक गुजर चलै। जोलहा के एक पसेरी भेटक चाउर आ दू-चारि दिन माँछ दए अबियैक तँ एक जोड़ी सलगा बीनि दिअए। बोचा मियाँक सलगा नामी रहै परोपट्टामे। मजगुत तेहेन जे एक जोड ीमे साल भरि निचेन। धारक ओइ पारमे अखनि जतए तोहर नरै कलमबाग छह, ओतहि सरपतक बोन रहै। ओकरे टाटी-फड की बिनल जाइ। सभ अपन-अपन काज करए; दिन हँसी खुशी बितल जाइ।
राजा बड नीक लोक रहथि। नीक-लोक की बूझु जे सुधंग रहथि। लोक सभ कहै जे राजा कें आँखि छन्हिए नै, काने टा छनि। सोझाँमे कतबो लए लिएक तँ हँसी खुशी दए दैत रहथिन। मुदा परोच्छ मे नहियो लिऐक आ केओ झुट्ठे कहि सुनाबिन तँ बुझू जे ओकरा पर अट्ठाबज्जर खसि पड ै। राजा रहथि कने जीहक पातर। माँगुर माछ जरे अँगूरक दारू खूब नीक लगनि। हम सभ पारी लगा क' बिछलहा मांगुर हवेली द' अबियौ। दारू टा बाहर सँ अबैक। ओकर बदलामे राजा एतए सँ मखानक लाबा पठावथि।
हमर बियाहक तीन बरखक बाद हमर बापो मरि गेलै। तेहेन ने सिंगी बिन्हलकै जे दू दिन जर धाह भेलै आ तकर परात मरि गेलै। सिंगीक जहरक मादे बुझले हएतह। कहाँदन एक बेर अजोध गहुमन अपन बिक्ख खरहीक झाँखुड़मे नेराए चराउर करै ले' गेल। ओम्हर सँ सिंगी आबि सभटा खाए गेलै। गहुमन जे घुरल तँ जहर नै भेटलै, तँ ओ आन्हर भए गेल आ अन्हइ बनि गेल। सिंगीक जहर हमर बाप ले तँ सते गहुमनेक जहर भए गेले। ओकरे फिरिया करम ले' बोचा मियाँक ओत' कप्पा द' समाद पठओलियै त' घरमे बीनल नै रहै। तखनि ओएह कहलकै जे राजाक हवेली पर एकटा पइकार अएलैए। रंग-बिरंग के कपड ा-लत्ता बेचै छै। कपड ा सभ बड पातर छै आ चिक्कन तेहन जेना पुरैनिक पात होइ'। हमरा सभ लग नकदी रुपैया कतए सँ पाबी। से माइक गराक हँसुली कटबन्हकी लगाए ओतहि सँ धोती मङओलियै। ओही बरख पच्छिम सँ आरो बहुत रास पइकार अएलै। भाँति-भाँति के जिनिस सभ लए कें। राजा कें अनदेसी चीज सँ लोभा क' पोटि लेअए आ एही नगर मे बसल जाए। पइकारी खूब चलै। लोक सभ सेहो अनदेसी जिनिसमे परकि गेल रहए। आब बोचा मियाँक कपड ा केओ नै पुछै। सभ नकदी रुपैया हथियबै ले' अपसियाँत रहए लागल। राजाक संगे हुनकर देबान आ आरो हसबखाह सभ ओहने भ' गेल। आस्ते आस्ते ओ पइकार सभ जमैत गेल। बादमे तँ अपनै नियम कानून चलाबए लागल। तखनि राजाकें चाँकि भेलनि। ताबत तँ समय बीति गेल रहै। पइकार सभ गोलैसी क' नेने रहय। ओकर मेंट सँ राजा कें लडाइ भेलनि। मुदा राजा हारि क' जान बचबै ले' रानी के संग ल' कतौ भागि पड एलाह। ओएह पछिमाहा गादी पर बैसल।
अपन घर मे हम तिनिए गोटे रही माए, हम आ फुलिया। हम मखान क तैयारी सुरू कएने रही। ओहि सँ नगदी रुपया आबए लागल रहए। ई राजा भेल तँ ओ मखान के दाम घटाए देलकै। अपन अपन पहिलुका नगरक पइकारक हाथे पानिक मोल बेचि दै आ अपने जे जिनिस बेचए से आगिक मोल। सभक हाल खराप होइत गेलै।
ओहि राजा के कथुक विचार नै छलै। हम सभ कमला माइक अरधना करी तँ चौल करए। कहै जे पहाड़ पर जे बरखा होइ छै आ बरफ गलै छै सएह उपर सँ नीचाँ खँघरै छै ओकरा नदी कहल जाइ छै। ओही मे सँ एकटा के नाओ छियै कमला। ओकर पूजा क' की है तै? ई पूजा-पाठ सभ काहिल आ अमरुख के चलाओल छियै। आर की की ने कुचरए कमला माइक मादे। ओकर देखादेखी अपनहु नगरक धनिकहा सभ हँ मे हँ मिलाबए- खरखाही लूटए। हम सभ की करितहुँ। राजा रहए। केओ किछु नाकर नुकर बाजए तँ भकसी झोकाए मरबाए दै।
एम्हर लोकक ई हालति भ' गेलै जे पाँचो आङुर मुँहमे जाए पर अट्ठाबज्जर। साँझक साँझ उपास पड ए लागल। राजाक दिस सँ चौरी चाँचर बन्दोबस्त हुअए लगलै। जकरा डाक बाजि क' पइकार सभ खरीदए आ ओहिमे बोनि पर हम सब खटी। अपन धंधा सभ चौपट्ट भए गेल। हमर माए जे सेर क सेर भेटक चाउर हँर्सेत बिलहि लै छल, तकरा मरबा बेरमे पाओ भरि खोंछि मे नै दए सकलियै।''
एतबा कहि ओ परेत थोड़ काल चुप्प भ' गेल, आ हिचुकि हिचुकि कानए लगाल। राजा सेहो सकदम्म भेल सभटा खिस्सा सूनि रहल छलाह। ओ किछु बाजए चाहलनि मुदा जीह जाँतल जेना भए गेल रहनि।
ओ परेत दम्म साधि फेर बाजल- ''मायक किरिया-करममे करज चढि गेल। मास दिन पर जखनि मोहनमाला टुटल तखनि जान सँ उपर काज लगलहुँ। सक्क नै लागए। पेट बढि गेल रहए। लोक सभ कहए जे तिल्ली बढि गेल छह। पथ्थो पानि पर आफद तँ दवाइ-बीरो कतए सँ होइतै। हम खटोसल भ' गेलहुँ। सभटा भार फुलिया पर पडि गेलै। तावत एकटा टेल्ह सेहो जनमि गेल रहै। ओकरा कन्हेठने' ओ देवानक हवेली जाए आबए लगलै। काराक बासि सँठले हमरा ले' नेने आबए आ अपने की खाए से नै बुझियै। बाद मे बुझलियै जे हवेलीक अँइठ खाए अपन पेट पोसै-ए। ई बात एक कान दू कान बिराबान भ' गेलै। बिरादरी मे फुलियाक बदनामी हुअए लगलै। हमरा सभ कहए- 'हवेली क काज छोडा दहक।' हम खेंघरा पर ओंघराइत सभटा लहूक घोट जकाँ पियैत रहलहुँ। बैसकीक दामस सेहो देल गेल। मुदा फुलिया के किछ टोकबाक साहस नै हुअए।
किछु दिन जखनि हवेली क सुअन्न खोराकी भेटल, तखनि कने सक्क भेल। एक दिन हमहूँ फुलियाक जरे हवेली पर गेलौ कोनो काज भङै ले। पानि मे पैसए बला काज करबाक साहस नै हुअए।
हवेली पर पहुँचले रही कि एकटा अजगुत खेल देखलहु। उतरबरिया कोठाक असोरा पर कुमर आ कुमरी खाइत रहथि। चेड़ी सभ भाँति भाँति क पकमान सभ चङेरिए चङेरी रखने रहैक। ओही ठाम नीचाँ मे यहाथहि करैत टोल परहक धीयापुता रहैक। कुमर आ कुमरी थार मे एक-एक टा पकमान लिअए। जे नीक लगै से अपने खाए नहि तँ धियापुताक हेंज दिस फेकि दै। दू चारि टा कुकूर से हो ताक लगओने रहै। फेकल पकमान के लुझै ले' जखनि छौडा सभ पछड म-पछडा करए तँ ओहि दुनू क संग चेडि या सभ सेहो हँसए। इएह खेल रहै। एही हेंजमे हम अपन फेकना के सेहो देखलियै। हमरा घिरना भ गेल।
हम अपन फेकना कें डेन धएने धूरि गेलहुँ। फुलिया के सेहो हवेली छोडाए देलियैक। एहि पर फुलिया कने नाकर नुकर कएलक। कहबो कएलक जे हवेली महलमे काज करै छियै। सालमे टू टा फाटलो पुरान तँ भेटि जाइए। चिक्कन केहन रहै छै, जेना भेटक फूल होइ। फुलियो के बोचा मियाँ क सलगा सँ हवेली क फाटल पुरान बेसी रुचए लागल रहैक। मुदा हम कने दमसओलियै तँ मानि गेल।
हवेली तँ छोड ाए देलियै मुदा ओही राति ठकउपासक हालति भ' गेल। फुलिया खूब हनहन पटपट कएलक आ फेर भोकडि पाडि क' कानए लागलि। हमहूँ कनैत कनैत सूति रहलहुँ। रातिमे सपन देखलहुँ जे माएक कोरा मे सूतल छी। माएक माथ पर दुनू कात छही माँछ चमकि रहल छैक। भेटक फूलक माला गरामे महमहा रहल छँक। हम कानि रहल छी, माय चुचकारि रहल अछि। हमरा परतारैत माय कहै छथि जे तों उत्तर नेपाल दिस सुकठीक बनीज करह। खूब उछराए हेतुह।
माएक आढ़ति कतहु बेकार गेलै-ए। से सत्ते कमला माइ हमरा जे बाट घरओलनि से बड नीक लागल। आर चारि-पाँच गोटे के सङोर कएलहुँ। धार मे पानि घटए लागल रहैक। इचना आ पोठीक अबार चलैत रहैक। छानि छानि क' सुखाबए लगलहुँ। सुकठीक बनीज खूब जमल। नेपाल पहुँचिते गामे गाम छिडि या जाइ। दुइए दिन मे एक बोड ा छुहक्का उडि जाए। फेर सभ सङोर क' गाम धुरि आबी।
दू-ए साल मे हमहूँ थितगर भ' गेलहु। बेस जकाँ रुपैया जर भ' गेल। तखनि सभ मीलि क' एकटा पोखरि तेसाला बन्दोबस्त लेलहुँ। भदवारि मे भखान तैयारी करी। मखान तँ अपनहि राज मे बिका जाए।
तेसर साल सुकठी लए के जखनि नेपाल पहुँचलहुँ तँ एक राति एकटा जंगलमे राति भ' गेल। हाथ हाथ नै सुझै। सभक मोन भेल जे एतहि राति बिताबी। लगमे एकटा घराड ी सेहो देखलियै। पानियो के सुपास रहै। ओतहि भानसक इन्तजात बात भेलै। फुलिया ओहि घराड ी सँ आगि माँगि क तँ तेहन गप्प कहलक जे छगुनता लागि गेल। ओ कहलक जे अपन नगर क पुरना राजाजी एतहि रहै छथि। ओ हिनका सभक बोली बानी सँ बुझि गेल रहनि। बाद मे गर सँ रानी जी कें देखलकनि तँ चट चीन्हि गेलनि। हमहँू सभ जाइ गेलहुँ सत्ते ओएह रहथि। सभटा ओहिना अखियास छलनि। हमरा सभ कें चीन्हि गेलाह। आँखि छुटलनि की घैल भ' अएलनि। भरि पाँज क' पकडि लेलनि। राति मे किन्नहु फूट मानस नै करए देलनि।
जखनि गाम घुरि अएलहु तँ राजा जी क गप्प टोल भरिमे कहलियौक। सभ हँ सेरी क तैयारी मे लागि गेल। सहथ तँ सभक घरमे रहबे करए बाँकी एक सय फड सा आ एक सय भाला बनवाए घरे घर छिपाए देलियैक। राजा जी सँ गप्प कएलाक बात जे ठीके दुर्गा महरानी सभक मोन पर सवार भ' गेल रहथि। पछिमाहा राजा कानो कान नै भनक लगलै।
तावत भदवरि सेहो बीति गेल। मखान क गूड ी फोड ैके जोगर मे लागि गेलहु। राजाक एकटा पोखरि मे तेकडी पर मखान उपजओने रही। एकदिन सिपाही आबि क' कहि गेल जे राजाजी अपनै दलान पर सोझाँ मे फोड ओथिन। हम सभटा गूड ी ल' हवेली पर पहुँचलहु। ओतहि फोड ए लगलौं। हमर नियम रहए जे मखान के ढ ेरी सँ पाँचटा पहिलुक फोका कमला माइ के भोग लगा दियनि तकर बाद बाँट-बखरा होइ। थोडेक गूडी फोडै' बाँकिए छल कि तावत रंग मे भंग भ' गेलै।
बड़की रजकुमरी जकर वयस पनरह सोलह छल हेतै, ऐठैत आएलि आ देखिते देखिते मखान क ढेरिये मे हाथ लगाए खाए लागलि। फुलिया एक दूबरे दबले मुहें रोकबो कएलकै मुदा ओ माननिहारि नै। तखनि हमहूँ कने जोर सँ कहलियै जे पहिलुक फोंका कमला माइ कें चढ तनि। अहाँ हाथ लगा देलियै त' सौसे ढेरी अँइठ भ' गेलै। अँइठ क नाम सुनिते ओ भभ क' हँसए लागलि आ कहलक जे हम कि गाए महीस जकाँ ढेरी मे मुँह लगा क' खेलियौए तखनि अँइठ केना भेलै?
''निखनात नै ने रहलै''- कहलके फुलिया।
ई गप्प सप होइए रहै कि ओ चंडलबा राजा हनहनाहत आएल।
- की बकझक करै छें?
-' गोढि बे, बड अँइठ कुँइठ बुझ' लगलहिन-ए। भाँड मे जाथु तोहर कमला माइ। सरबे पंडिताइ झारै छें। चुपचाप काज कर।'- राजा बमकए लागल।
हमरहु एँड ी सँ टिकासन धरि लेसि देलक। सभ सँ बेसी खराब लागल कमला माइ के गरिआएब। भदेस सँ आबि क' केओ हमरा सभक अदौ के बात के नकारि देत, ओकरा पर हँसत ते से केना बरदास्त हैत। एक तँ ई राजा पच्छिम दिससँ जिनिस सभ आनि आनि क' एतुका लोक के कोंढि बना देलक। जखनि मिलहा कपड ा अनलक तकर बाद बोचा मियाँक दुर्गति हमरा देखल छले। ओइ सभ चालि सँ दूहि लेलक ई अइ लोक के। तइ पर सँ आब हमरा सभक' कमला माइ के सेहो गरिआओत। हस सभ जँ कमला माइ क अरधना करिते छी तँ एकरा कोन दालि गलै छै। ई सभटा बात हमरा माथे मे घुमए लागल। हमहूँ तानि क' कहलियै- ''मुँह सम्हारि क' बाजह। कमला माइक मादे किछ अंट-संट बजलह तँ जे ने से भ' जेतह।''
हमर ई गप्प सुनिते ओ चंडलबा राजा जेना बताह भ' गेल। हाक देलकै तँ चारि पाँच टा सिपाही' दौड़ल। ओहिमे सभ अपने जाति भाय रहए। मुदा राजा के एँडी चटनिहार सभ। ओ' सभ डंटा ल' क' हमरा चारूदिस सँ लठियाबए लागल। से देखि क' हमरा आर लहरि चढि गेल। की कमला माइ ओकरा सभक माय नहि छलखिन।
राजाक आढति पर हमरा दुनू गोटे कें रस्सामे बान्हि घिसियौने एही सिमर गाछ तर अनलक। हमरा गाछक एही डारि मे उलटा लटकाए देलक आ हमरा सोझाँ मे ओ पाँचो छबो टा सिपाही फुलिया के नोचि पटकि देलकै।''
एतबा कहि ओ परेत बपहारि काटए लागल। ओकरा कस्साक मारि मोन पडि आएल रहै। पह फाटि रहल छलै'।
राजा उठिक क' घैल सँ पानि ल' कुरुर कएलनि आ खोपडि मे बैसि रहलाह।
परेत फेर बाजल- ''हे राजा आब राति बीति रहलै-ए। आब हमरा चल जएबाक बेर भए गेल। अहाँक दोसर सबाल क जबाब हम काल्हि देब''।
राजा कें भोरहरबा क बसात क सिहकी अलसाए देने छलनि। कने काल ले आँखि मुनाए गेलनि। सुरुजक इजोत पडि ते आँखि खुजलनि तँ ने परेत छल, ने खोपडि , न घैल। सभ किछु अलोपित भ' गेल रहए। ओ सिमरक गाछक जडि मे अपनाकें दूबि पर बैसल पओलनि। कात मे सुखाएल धार साँपक केचुआ जका बूझि पडि रहल छल।
दोसर दिन राजाक मजलिस लागल। दरबारी सभ जुटल रहथि। चर्चा आरम्भ भेल। सभक मोनमे एकेटा चिन्ता; सभक ठोर पर एके गप्प, कमला माइक कोन अनठ भेलनि जे एना निसोख भए गेलीह। पोखरि मे सोह किएक नहि फुटैत अछि'। पानि बेतरेक नगर क हालति खराप भए गेल रहैक। एक टूटा जे रजकूप टेक घएने रहए ओहू सभमे पानि दुइ तीन हाथ खसि पड़ल रहैक। एम्हर बरखा क कोनो टा आस नहि। जखनि हथियो गरजिक' चल गेल मेघ नहि बरसल तखनि स्वाती सँ की आस। राजा घाड झुकओने सभटा सुनैत चुपचाप बैसल छलाह।
एही बीच दरबान इतलाए बाजल फाटक पर चारि गोटे ठाढ छथि। सरकार सँ भेटँ करए चाहैत छथि।' राजा कहल- ''हाजिर करह।''
थोड ेक कालमे ओ चारू गोटे आबि राजा कें सलामी दए कात मे ठाढ भए गेलाह। एक गोटे डाँङसँ एकटा चीठी निकालि राजा के देलनि। राजा चीठी पढि जखनि राखि देलनि तखनि ओ बजलाह-
''सरकार अपनेक नगर से हम सभ अपनेक आदेश सँ हवा-मिठाइक बनीज करैत छी आ ओकर कर ठीक समय पर खजानामे जमा करैत छी। एहि नगर क धियापुताई हवा मिठाइ किनैत अछि। ई हवा-मिठाइ बनाए कोन धरानिए अपन नगर सँ अनैत छी से सरकार कें की कहब। हमरा नगर क रानीजी सरकारक बहिन थिकीह। एही बेर भरदुतिया मे जएबा मे कोन कष्ट भेल रहए से जनैत होएबैक। चारि टा धार तँ नाह सँ टपए पडै छै। ऐते तरदुत उठाए हम सभ एतए बनीज करैत छी जे दुइ एक सेर धान जर करी आ एहि नगर क धियापुता लिलोह नै हुअए। मुदा........।
''मुदा की?'' -राजा पुछल।
-''हम सभ सरकार क जुत्ता तर छी। किछु ऊँच नीच बजना जाए तँ जान बकसि दी।'' दाँत निपोड ैत ओ पइकार बजलाह।
-''निडर भए कहू।'' राजा गंभीर होइत बजलाह
-''सरकार क खास आदमी हमरा सभ क बनीज के भुस्साथरि बैसाबए चाहैत अछि। हमरा सभक पेट पर लात मारए चाहैत अछि। तैयो.........।''
-''तैयो की? खुलासा बाजू''। राजा तनि क' बैसलाह।
-''तैयो जँ केवल हमरा सभक बनीज के भुस्साथरि बैसाए हुनकर हिया जुड़ा जानि सँ हमसभ बिना किछु गलगुल कएने दोसर नगरक बाट धए लेब। मुदा ओकर छओ कतहु पाओ कतहु छैक। ओ चाहैत अछि जे एही बहाना सँ सरकारक ठोरक लाली छीनि ली। हमर नगर सँ सरकार क हबेली मे जे किछु वस्तुजात अबैत अछि, ओहि सभ लेल सरकार कें लिलोह कए दी। बाहरी दिन दुनियाँ सँ सरकारक लागि तोडि दी। ताहू सँ बढि क क' एकटा भाइ बहिनक सिनेहक डोरी के झटकि तोडि दी''।
राजा चौंकलाह। थोड बे काल पहिने अपन बहिनक चीठीमे पढ ने रहथि जे सरकार बड बिगड ल छयि। तखनि तँ अर्थ नहि लगलनि मुदा आब बुझि गेलाह। राजा कें चुप देखि ओ पइकार फेर बजलाह-
''हमर नगरक राजाजी बड बिगड ल छयि। रानीजी सँ चिठी लिखाए हमरा सरकार क सोझाँ हाजिर भए नौ छौ करबाक आढ ति देलनि अछि। आगाँ सरकार क आढ ति माथ पर''।
-''के अछि ओ हरामी, जे एहन काज क' रहल अछि''।
राजा बमकलाह। लोहा तपि चुकल छल। हथौडा क चोट दए तरुआरि बनएबाक ताक भए गेल रहै।
-''सरकारक खास आदमी अछि। केसो साहु। हवेलीक खास हलुआइ''।
-''केसो साहु? ओ तँ बड नीक लोक अछि।'' -राजा कें आश्चर्य भेलनि।
-''सरकारक आबेस पाबि ओ अपना कें नल महराज आ धन्वन्तरि वैदराजहु सँ पैघ बुझए लागल आछि।''
-''ओ की कएलक से खोलासा बाजह।'' राजा कने उत्तेजित भए गेलाह।
तुरत केसो साहु बजाओल गेलाह। तखनि ओ पइकार बजलाह- ''हमर सभक हवामिठाइक ई देखसी क' बेचैत छथि। हमसभ एक पसेरी धान मे जतेक बेचैत छी, ओतेक ई एके अढ़ैयामे बेचि दैत छथि। हमसभ मुहें तकैत रहि जाइत छी।''
केसो साहु सें पूछल गेल तँ ओ बाजल-
''ई ठीके कहैत छथि। एक दिन हमर नाति एक झोडी हवामिठाइ किनलक तँ दुइ चारि टा हमहूँ चिखलहुँ। सुआदलहुँ तँ बुझि गेलियै जे ई मखान क लाबा के बनल छै। ओकरा चीनीक सिरकामे पागि क' रंग मिलाए झोडीमे सीबि क' बेचैत छथि। तखनि हमरा ओ बड महग बुझाएल। एक दिन अपन नाति ले' अपनहि सँ बनओलहुँ। तकर बाद आढ ति पर सँ आढ ति आबए लागल। हमहूँ घानी पर सँ धानी बनबैत गेलहु। इएह बात छियै सरकार''।
केसो साहु चुप भए गेलाह। ओ पइकार एक गोटे दिस संकेत करैत उतराचौरी आगाँ बढाओलनि- ''सरकार, ई छथि हमरा नगर ओ हलुआइ जे पहिले पहिल ई हवामिठाइ बनओलनि। आ संगहि दोसर छथि हमरा सभक वैद्यजी; जे ओहि मिठाइमे एहन दवाइ फेंटैत छथि, जकरा खएला सँ तागति बढैत छैक। बहुत तरहक बिमारी सँ सुरक्षा होइत छैक। हमरा सभक हवामिठाइक बिक्री घटला सँ एहि नगरक धियापुता ओहि दवाइ सँ वंचित रहि जाइत अछि आ हिनक बनाओल लाबा खाए ठकल जाइत अछि। तें एहन ठक कें सजाए देल जाए। आगाँ सरकारक आढति माथपर'।
केसो साहु राजाक खास हलुआइ रहथि। हुनकहु अपन लूरि पर गुमान रहनि। तें ओहो हारि मानि चुप बैसनिहार नहि।
-'सरकार, हमरे नगरमे उपजल मखान' कें माटिक मोल कीनिक' ओकरा ई लोकनि आगिक मोल बेचैन छथि। जतेत हवामिठाइ ई एक पसेरी धानमे बेचैत छथि, ओतेक मखान तँ एतए लोक मङनीमे बिलहि दैत अछि। चीनी बड़ थोड लगै छै। ओकरा सोन्हगर बनबै ले' हम कचूर दैत छियैक, जे सभ ठाम बाडी-झाडीमे अलेल उपजे-ए। एहन मिठाइक बदला मे मेहनति सँ उपजाओल एक पसेरी धान आन नगर चल जाइत अछि से हमरा नहि सोहाएल, तें हमहूँ बनबए लगलहुँ। टटका-टटकी बनबै छी। टटका के परतर हिनकर हवामिठाइ कत' सँ करतनि। नै जानि कते दिनुका बनलाहा रहैत छनि।
एतबहिमे हवेलीक घंटा बाजल। सभक भोजनक समय भए गेल रहनि। तें राजा कने अगुताइत पइकारसँ पुछल अहाँकें आर जे किछु कहबाक हो से कहि दिय'। हम विचार करब आ जा धरि कोनो नौ छौ नहि भए जाइत अछि ता धरि हवामिठाइक बनीज नहि हुअए। केसो साहु सेहो ओ मधुर नहि बनाबथि'।
ओ पइकार बजलाह- ''हमर हवामिठाइमे सहरगंजा रंग नहि मिलाओल जाइत अछि। ओ रंग हम बनारस सँ मङबैत छी। नेपालक जंगल छानि क' आनल जडी बूटी सँ ओकरा सोन्हगर बनबै छी। जाहि झोडीमे बन्न कए ओ बेचल जाइत अछि से कलकत्ता सँ अबैत अछि। ओहिमे बन्न कएलाक बाद बासि-तेबासिमे कोनो अन्तर नहि पडैत छैक। मासो दिनका बाद ओहने रहैत अछि। एहि सभमे खर्च पडैत छैक, तरदुत होइत छैक। तखनि एक सेर धानमे एक झोडी बिकाइत अछि। सरकार कें बेसी कहबाक काज नहि। बुधियार कें कनखिए काफी। तखनि तँ सरकारक आढति माथ पर।''
ओ पइकार चुप भए गेलाह। राजाक मजलिस टुटल। राजा चुप्पे अन्नर दिस बढ़ि गेलाह, जतए चेड ी हाथ-पयर धोबा ले सोबरना नेने ठाढि छलि।
दिन बीतल; साँझ पड ल; सूर्य अस्त भेलाह; राति भेल। राजाक छातीक धुकधुकी बढ ैत गेलनि। पछिला रातुक एक एकटा गप्प मोन पडैत छलनि तँ रोइयाँ ठाढ भए जाइत रहनि। सिमर गाछपर उनटा लटकल ओ परेत आ ओकर हँसब बाजब आ कानब, सभटा आँखिक सोझाँ नाचि उठनि। बुझाइन जे ओ कोनो दोसर लोकमे आबि गेल होथि। एसकर होइतहि राजा एहि लोकक सभटा बात बिसरि जायि।
अनमनाएले जकाँ राजा रातुक भोजन कए जखनि अपन कोठरी अएलाह तखनि दस बाजि रहल छल। सिमर गाछ तर जएबाक बेर लगिचाए गेल रहनि ते छाती क धुकधुकी आर बढि गेलनि। एक मोन मेलनि जे आइ नहि जाइ मुदा फेर दोसर मोन तुरत चेतौनी देलकनि जे नहि गेला सँ जँ कहूँ ओ परेत खिसिआए गेल तँ किछु क' सकैए। सँगहि इहो मोन मानि गेल रहनि जे गोसाउनि जकरा मादे कहने रहथिन से ओएह परेत थिक। तखनि जँ परेतक समटा गप्प नै सूनि लेताह तँ कमला माइक रुसबाक कारण आ बौंसबाक उपाय केना बुझताह। तें जाएब तँ आवश्यक छलनि।
समय बितल जा रहल छल। राजा पलंग पर पड़ल टकटकी लगओने घड ी दिस देखि रहल छलाह। राजा कें घड ीक प्रतीक्षा जतेक नै छलनि, ओतेक छलनि रानीजीक सुति रहबाक प्रतीक्षा। तें अपन छाती पर राखल हुनक बामा हाथक कँगनाके कखनहु खनखनाए बुझबाक प्रयास कए लेथि जे ओ सूति रहलीह कि जगले छथि।
जखनि बेस काल धरि राजा सूइल सँ पाइत धरि आ पाइत सँ सबरब धरि सोहरओलनि आ रानी नहि सगबगएलीह, तखनि गँओसँ हुनक हाथ अपन छाती पर सँ हँटाए कात कएलनि। रानीजी कें नीक जकाँ देखलनि तँ बुझएलनि जे ओ सूतलि छथि। राजा निश्चिन्त भए पलंग सँ उठलाह।
कामदार कपड ा सभ खोलि सहरगंजा मिरजइ आ धोती पहिरलनि। खुरिया खोंसलनि आ कोठलीक केबाड खोलए बढ लाह कि रानीजी भभा क' हँसैत पलंग पर बैसि गेलीह। राजा थकमकाए गेलाह।
रानीजी झटकि क' हिनका आगाँ आबि ठाढ भए गेलीह। हुनक खूजल केस भुइयाँ लोटाए लागल, काड ा खनकि उठल, डँडकस मचकि गेलनि, केचुआ मसकि गेलनि, घोघट ससरि गेलनि, पसाहिन चमकि उठल, लट गमकि उठल, दुनू ठोर थर थरएलनि आ आँखिक दुनू कोर सँ दू बुन्न नोर गाल पर पिछडि गेल।
रानीजी बजलीह- ''राजाजी! राजाजी! एते राति क' के मोन पड़लीह कजराबाली कि गजराबाली! मुजराबाली कि बजडाबाली! राजाजी! कतए विदा भेलहु चुप्पेचाप। राजाजी! रूपाके दियामे पाटक टेमी जरौलौं, सोनाके कजरौटीमे कजरा जे पाड लों, से कजरा नोर सँ धोखरल जाइए यौ राजाजी! कोस भरिक फुलवारी सँ सोनजडी अँचरामे फूल जे बिछलियै, भौंरा कि मधुमाछियोक सूँघल फूल नै छुबलियै, खुरचनक टकुरीसँ बाडीक बाँङके सूतो कटलियै, ओहि सूतक तानीमे गजरा गँथलियै। अहाँक हाथक छुतियो ने भेलै; सिरमामे डाला पर पुरैनिक पतौडामे रखले मौलाए गेलै यौ राजाजी! ओहो कजरा, ओहो गजरा रूचल नै अहाँ के यौ राजाजी! तखनि आब नयनाके नोरसँ हियाके दिया जरएबै, सुन्न अकासक कजरौटीमे पाडल कजरा लगेबै, इन्द्रक फुलवारीसँ लोढ ल फूलक गजरा गँथबै, चचरीक बजडा चढि संसारक समुद्र नाँघि ओहि पार जेबै, इन्द्रक फुलवारीक एक कोनमे अहाँक नामक आसन लगेबै, आसनक आगाँमे मुजरा लगेबै। ओतए तँ अहाँ अएबै ने यौ राजाजी!''
रानीक आँखि सँ दहोबहो नोर झहरए लागल। राजा कें अकबक किछु नहि सुझाइन। असल बात कहि रानीजी कें डेरबए नै चाहैत रहथि। तखनि किछु कहि परतारि क' चलि दितथि से कठिन छलनि। ओ दूधक धोएल तँ छलाह नहि जे हुनक बात पर रानीजी कें विश्वास भए जैतनि। एहिना कतेक राति ठकिफुसिया क' गजराबाली कि कजराबालीक दुआरि नाँधि चुकल छलाइ। तें ओ अस्त्र सभ आब रानीजी ले' व्यर्थ भ' गेल छल।
राजा बजलाह- ''हे धनि! जुनि कानू । गोसाउनिक सीर पर बरैत दीप अहाँ छी। नगरक कोन-कोनमे जरैत अंडी तेलक उकारी सँ सौतिनिया डाह किए करै छी? आश्विनी सँ रेवती धरि तारका सभक भोग कएनिहार चन्द्रमा की अपन चन्द्रिकाके छोडि दैत छथि। हे धनि, अग्निक ज्वाला, जलक शीतलता, आकाशक शून्यता जकाँ अहाँ हमर छी, जकरा बिना कजराबाली कि गजराबालीक कोनो मोल नै। मुदा एखनि तँ ओकर चर्चे व्यर्थ। हम तँ आइ दोसर काजसँ जा रहल छी। एकटा आवश्यक राज कार्य भए गेल अछि।
- ''एतेक राति क'?'' रानीजी कें जेना विश्वास नै भए रहल छलनि।
- ''हँ धनि, आफदक बेर मे की राति आ की दिन?''
- तखनि कपड़ा छाड बाक कोन काज?'' रानी जिरह करए लगलखिन।
राजाक चोरि पकड ा गेल। एकर कोनो जबाब हुनका लग नहि बँचल। अन्तमे राजा थाकि हारि सभटा खेरहा सुनाए देल।
रानी बजलीह- ''हमरहु सँ छल कएलहुँ राजाजी! मुदा आब पछिला चूकक गप्पे कोन? आइ हमहूँ जाएब अहाँक संग।''
''अहाँ?'' -राजा कुदि उठलाह।
- ''हँ राजाजी! भूत-परेतक मुँहमे एसकर केना जाए देब। अहाँक रक्षा लेल हमहुँ जायब।''
- ''हमर रक्षा अहाँ करब?'' राजा के रानीक ई गप्प ओहिना अनसोहाँत लागि रहल छल जेना ओ पुरैनिक पातक ढाल ल' लड ाइमे जएबाक गप्प कहि रहल होथि।
- ''हँ राजाजी! बियाहक साल सुखराती निशाभाग रातिमे नानीसँ जे सिखलहुँ से आइ नै तँ कहिया काज देत?''
राजा कें सभटा रहस्यमय बुझा पडि रहल छलनि। रानीक एतेक आत्मविश्वास! सुुखरातीक निशाभाग रातिमे सिखबबाक बात सुनि राजा कें ठकमूड ी लागि गेल।
- ''एना की तकै छी? हमर नानी की सभ जनै छलीह आ हमरा कते सिखओलनि से आइए परताए लिय'। अपन टोना-टापर सँ हम एहन घेराबा बनाए लेब जकर भीतर परेतक बापो किछु नहि कए सकत।'' रानीक मुट्ठी तनि गेल।
- ''मुदा जाएब केना? पहरूदार बुझि जाएत तँ सौसे घोल भए जाएत तखनि एक-एक के सभ संग लागि जाएत।
- ''केओ नहि बुझत। थम्हू कने। हम सभटा जोगाड़ धराए लैत छी।''
रानीजी केबाड खोलि फुलबाड ी पैसलीह; ओतए एकटा पैघ सन मएनाक पात तोड लनि। भनसाघर गेलीह; पिठार पिसलनि आ आबि गेली झट द' राजाक लग; मएनाक पात पर अरिपन देलनि। अपनहु ढाढ भ' गेलीह आ राजाजी कें सेहो सटि क' ठाढ होएबा ले' बजओलनि। गेंठ जोड लनि; किछु मन्त्र पढ लनि आ ओ मएनाक पात धरती सँ उठल आ खुजल केबाड देने आङन आएल आ अकासमे उड ए लागल। रानी पुछलनि- ''डर तँ ने होइ-ए?''
- 'नहि, आब सभ डर बिलाए गेल।'' राजाजी सभ किछु समर्पण कए देलनि।
ओ मएनाक पात दुनू कें थम्हने अकासमे उड़ल जा रहल छल। रानीजी बेर बेर पुछथिन्ह- ''ओ सिमरक गाछ केम्हर छैक?''
राजा कें दिसाँस लागि गेल रहनि। एक तँ रातिक समय, निचला घर-आङन, गाछ-बिरिछ किछु सुझि नहि रहल छलनि। ताहि पर सँ आकाशमार्ग देने यात्रा। से जएबाक छलनि पूब दिस, देखाए देलखिन पच्छिम दिसक बाट। रानीजी ओम्हरे इसारा कएलनि; ओ मएनाक पात ओम्हर उड ए लागल। जखनि किछु दूर गेलाह तँ एकटा खूब चतरल गाछक अछाह बुझएलनि। ओकरहि सिमरक गाछ बूझि दुनू गोटे ओतहि धरती पर अएलाह। मुदा ओ सिमर नहि पाकडि क अजोध गाछ छल।
राजा चिंतित भए गेलाह। अन्हार राति चारुकात भकोभन्न। कतए आबि गेल छी सेहो ज्ञान नहि रहलनि। बिना प्रकाशक संचारसे कोनो उपाय करबामे अपनाकेँ असमर्थ बुझलनि। आकाश स्वच्छ छल तेँ राजाकेँ अष्टमीक चन्द्रोदयक आस जगलनि। चन्द्रोदयमे किछु बिलम्ब रहैक तेँ ओकरे प्रतीक्षा करैत दूनू गोटे असोथकित भए ओही पाकडि क एकटा धोधडि मे सोनचिड ै दूनू परानी रहैल छल। राजा आ रानी जखनि ओतए बैसलाह तँ चिडै बाजल हे धनि, आइ देखू जे केहेन हमरा सभक भाग जोड गर अछि जे एक दिस हमरा सभक सन्तान हुअ' बला अछि आ दोसर दिस एहन अभ्यागत आबि गेल छथि। हमरा सभके चाही जे हुनकर स्वागत सत्कार करी'।
राजा नीचामे बैसल दुनू परानीक गप्प सुनए लगलाह। चिड़िन बाजलि- ''हँ ठीके कहलहुँ। एक तै बच्चा हुअए की बूढ , जबान हुअए कि बेसाहु, घर पर पहुचल अभ्यागत देवताक रूप होइत छथि, ताहूमे ई तँ एहि नगरक राजा आ रानी छथि सेहो बाट भोतिया क' एतए आबि गेल छथि तेँ जते धरि भ' सकए से हुनकर सत्कार करियौन। दुःखक बात ई जे हमरा आइ बिछाओनहु पर सँ उठबाक सक्क नै लगै-ए।तें हुनका दुनू सँ आशीर्वादो लै ले' हम नै निकलि सकब।''
- '' अर तँ जे से...। सभसँ तँ चिन्ता अछि जे की ल' क' सत्कार करबनि? आइ जे हम जर क' अनने छी से एक तरहें अँइठे अछि।'' चिडै बाजल।
- ''झोडी तँ ओहिना मुनले छैक तखनि अँइठ केना भेलै? लोल सँ पकडि के जे अनने छी तेँ अँइठ कहै छियै की?'' चिडि न पुछलकै।
- ''नै से बात नै छै। ई मनुक्खक अँइठ थिक।''
- ''कत' सँ अनलहुँ?''
- 'हे धनि, आइ हम अहलभोरे अहाँ ले' कोनो बढ़ियाँ सनेसक खोजमे निकलहुँ तँ इच्छा भेल जे इन्द्रासनक फुलबाड ी जाए ओतहि सँ कोनो सोन्हगर फल नेने आबी। उडैत उडैत ओतए गेलौं तँ ओकर रखबार हमरा एसकरे देखि भीतर पैसबा सँ रोकि देलक। ओ कहलक जे एहि फुलबाडीमे बिना अपन प्रियाके केओ नै जाए सकैए। की देवता, की गन्धर्व आ की पशु-पक्षी, एसकर मुँह बिधुअबैले' एतए टपि नै सकै-ए। तखनि हम अपन सन मुँह नेने धरती पर घुरि अएलहुँ आ एतहि एहि नगर सँ ओहि नगर बौआए लगलहुँ। जाइत-जाइत एक नगर पहुँचलहुँ। ओ नगर एतए सँ पच्छिम अछि। ओतए राजाक अटारीक पछुआड मे ई हवामिठाइक झोडी सभ मारते रास फेकल देखलियै। पहिने तँ हमरा सक भेल जे कहूँ कोनो जाल-फाँस तँ ने बिछाओल छैक। थोडेक काल एहि गाछ सँ ओहि गाछ चकभाउर दैत रहलहुँ। देखलियै जे कौओ सभ निघोख भए एक एकटा झोडी उठाए रहल अछि तखिनि हमरहु कने हिम्मत बढ ल। मुदा फेर सोचलहुँ जे पहिने एहि हवा मिठाइक सम्बन्ध मे सभटा भजिया ली। सन्देह भेल जे एत' ई फेकल किए गेलै? कहूँ जहर माहुर तँ ने मिझहर भए गेलै? संयोग भेल जे एकटा कौआ ओहि हवामिठाइक झोडी लूझि क'ओही गाछ पर बैसल जाहि पर हम रही। हम ओकरा सँ पुछलियै तँ ओ कहए लागल-
''तों दूर देससँ आएल बुझाइत छह तेँ किछुनै बुझल छह। आइ एक माससँ सौंसे नगरमे घरे-घरे ताकि क' ई फेकल जाए रहलै-ए।
-''किए फेकल जाए रहलै-ए?'' -हम पुछलियै।
-''किए फेकल जाए रहलै-ए?'' -हम पुछलियै।
-''किछु नै बुझल छह? तखनि सुनह चुपचाप। करीब एक मास भेल हेतै। रजकुमरीके मोन खराप भए गेलैक। एकटा वैद अएलै। ओकर दवाइ गुन नै कएलकै। दोसर अएलै। तेसर अएलै। एहिना वैद सभक धरड़ोहि लागि गेलै मुदा रजकुमरी निकें नै भेलै। तखनि बहुत दूरके नगरसँ एकटा वैद अएलै। ओ रजकुमरी के मादे च-तु-के सभटा पुछारि कएलकै। की की खाइ ए; कतए कतए घुमै-ए; कोन कोन कपड ा पहिरै-ए; सभटा जखनि भँजिया लेलकै, तखनि जे दवाइ देलकै तेँ दुइए दिनमे रजकुमरी टनमना गेलै। ओएह वैद कहलकै जे ई झोडीमे बन्न हवामिठाइ खएला सँ भाँतिके गरू हेतै। ओएह राजाके कहलकै जे सभके मना कए दियौ जे ओ हवामिठाइ नै खाए। राजा ओइ वैदक करामात देखि नेने रहए तेँ विश्वास भ' गेलै। तहिया सँ अइ नगरक लोक केओ ई हवामिठाइ नै खाइए।
- ''तखनि तँ हलुआइ सभक लोटिया बुडि गेलै!'' हम कहलियै।
- ''नै बुड लै। राजा एकटा तरकीब निकालि लेलकै। राजा कहलकै जे ओ हलुआइ सभ ई सभटा हवामिठाइ आन आन नगरमे जाए बेचत। एहि राजाके सासुर एतए सँ दस कोस पूबमे छै। ओतए तँ खूब पैकारी जमि गेलैए।''
गाछक तरमे बैसल राजा चौकलाह। सोनचिडै हिनके नगरक मादे कहि रहल छल। हवामिठाइक पैकारी ठीके हिनकर नगरमे खूब जमि गेल छलनि। राजा आर कान पाथि कए ओहि सोन चिड ैक गप्प सुनए लगलाह। सोनचिडै कहि रहल छल- ''हे धनि, सएह कहैत छी जे जखनि केओ ओहि हवामिठाइक भोग कएनाइ छोडि देलक, तखनि तँ ओकरामे आ अँइहमे कोन अन्तर? निछरल वस्तुके अँइठ नै कहबै तँ ककरा कहबै। तेँ कहै छी जे एहन अँइठ वस्तु लए राजा-रानी सनक अभ्यागतक सत्कार केना करब।
- ''तखनि की करी?'' चिड़िन पुछलकै।
- ''सएह तँ हम अहाँसँ पूछै छी?''
- एहि पर चिडि न बाजलि जे राजा आ रानी अन्हारमे भोतिया कए एतए आबि गेल छथि, से अहाँ जाइ हुनका रस्ता देखा दियनु। बड प्रसन्न हेताह। आ ई एकटा ठहुरी सेहो दए देबनि। ई हम इन्द्रासनक फुलबाडी सँ अनने रही। एकर चमत्कार छै जे मुइल लोक, कि हड्डियोमे जँ ई ठहुरी भिडा देल जाएत तँ ओ जीबि उठत।''
ई सुनैत देरी राजा खुशी सँ नाचि उठलाह। अखनहु चन्द्रमाके उगैमे किछु देरिए छल, मुदा अन्हार कने कम भए गेल रहै। एही समयमे ओ चिडै गाछ पर सेँ उतरल। आबि कए राजारानी केँ प्रणाम कएलक आ इन्द्रासनक फुलबाड ी सँ आनल एक बीतक एकटा ठहुरी राजाक हाथमे देलकिन। राजा ओ लए माथ चढाए मिरजइमे खोंसलनि। तकर बाद ओ चिड ै कहलकनि-
- ''हे राजा! हे राजा! अहाँ सभकेँ कतए जेबाक अछि? कहू तँ बाट देखाए दी।''
राजा ओहि सिमरक गाछक नाम लेलनि तँ ओ चिडै आगाँ-आगाँ उड ल। रानी सेहो मएनाक पात हँकलनि आ सिमरक गाछतर पहुँचि गेलाह।
तावत धरि अष्टमीक चंद्रमा उगि गेलाह। साँसे बाध इजोरिया पसरि गेल। धरतीक फाटल दरारि सेहो देखा पड ए लागल।
सोनचिड़ै केँ घुरि जेबा ले' कहि रानीक सँगे राजा खोपड ीमे जा बैसलाह। पछिया रातिसे खोपडि यो बेसी नाम-चाकर रहैक। एतबे नहि ओहि दिन पुआरक सेजौटक बदलामे गादी आ मसनद सेहो लागल रहैक। रानी कहलथिन- ''राजा जी! ई कोनो छोट-छिन परेत नै छी। एकर आत्मा बहुत दिन सँ बौआए रहल छै। एकर उद्धार अहाँकेँ करबाक हएत।''
राजा पुछल- ''केना उद्धार होएतैक से कहू।'' 
रानी उत्तर देलनि- ''मरबाक काल एकर जे ममोला छल होएतैक से जँ पूरा भए जाइ तँ एकर उद्धार भए जाएत।
दुनू गोटे परेतके अएबाक समयक प्रतीक्षा करए लगलाह। परेत आएल। फेर ओ ओहिना उलटा लटकल छल। ओतहि सँ दुनू गोटेके प्रणाम कएलक आ बाजल- ''हँ, तँ सुनह हओ राजा। काल्हि राति हमरा हँसी लागि गेल रहए। तकर कारण सुनह। तोहर परदादा अपना जिबैत राज हासिल नै कए सकलखुन ओ अपने नेपालेमे जान गमओलनि। हुनकर बेटा बहुत दिन धरि लड ाइ करैत रहलाह तखनि जीत भेलनि। ओ पछिमाहा चण्डलबा राजा मारल गेल। ओकर लोक सभ अपन नगर भागल। नवका राजा जखनि गद्‌दी पर बैसलाह तँ एतुका अपन रोजगारके खूब सह देलनि। गरीब गुरबा धन्य-धन्य भए गेल। एहन रहथि ओ राजा। मुदा हुनके सन्तान भए तों अप्पन बोली-बानी, भेष-भूषा, चालि-चलनि सभटा बिसरि गेलह। हओ, देखसी पर कतेक दिन चलएबह ई राजपाट। हओ पछिमाहा दारू आ दछिनाहा बुलकीबालीक संग रभसैत काल कहाँ कोनो बाधक रखबार मोन पड ैत छह। काल्हि केना मोन पडि गेल रहह ई कमलाक कछेरक ई सिमरक गाछ आ ई पाँच पुस्तके समयसँ उनटा लटकल एकटा गोंढि ! तेँ हमरा हँसी लागि गेल रहए।''
रानीक आँखि सँ दहोबहो नोर बहए लागल। राजा सेहसे अपना के सम्हारि नै सकलाह; हिचुकए लगलाह- ''हे कमला माइक सपूत, आइ अहाँ हमर आँखि खोलि देलहुँ। हम एतए बन्धनक तरमे सप्पत खाइ छी जे अप्पन बोली-बानी; चालि-चलनि, भेष-भूषा नै छोड़ब; अनकर देखसीपर नै उड ब। हम सप्पत खाइ छी। मुदा अखनि हमर राजक प्रजाके बचाउ। प्रजा पानि-पानि क' मरि रहल अछि। अहाँ चलू। अहाँ गोहारि लगाएब तँ कमला माइ घुरबे करतीह। हमरा सन पतितसँ कमला माइ सत्ते रूसि गेल छथि। अहाँक बात ओ नै कटतीह।'' एतबा कहि राजा उठलाह आ सोनचिड ैक देल ठहुरीसँ ओहि परेतक ठठरीके हँसोथि देलनि। थोड बे कालमे सत्ते ओ परेत एकटा कठमस्त जुआनक बानामे उलटा झुलए लागल। राजा सिमरक गाछपर चढि ओकर पयरक बन्धन खोलि देलनि। मनुक्ख बनल ओ परेत राजा क आगाँमे कर जोडि ठाढ गए गेल। राजा ओकरा भरि पाँजमे ध' लेलनि।
तीनू गोटे पयरे महल घुरि अएलाह। पूब दिशा सिनुराए रहल छल। कमला माइक ओ सपूत कर जोडि ' राजा आ रानी केँ कहए लगलनि-
'' हे राजा, हे रानी, जहिया परेत बनि घुमैत रही तँ मोन होअए जे अइ जिनगी सँ उद्धार भए जाइत, मुदा नहि आब नै। आब हम सभदिन परेते बनि क' रहए चाहै छी। कमला माइक अइ कोरा सँ बेसी सुख कतौ नै भेटत। हम एतहि रहब परेते बनल रहब। जहिया जहिया कमला भाइ रूसि जएतीह तहिया तहिया हुनका बाँसब। हमर बात मानती नै ते कि? आ हमरे किए? सभक बात मानतीह। माय कतौ बेटा सभसँ रुसलै-ए। ओह बतहियाके की बेटा सभक बिना चेन भेटतै। ओ रूसल नै अछि। हे देखू ने, हम बौसे ले' जाइ छी मुदा हे राजा, हे रानी, सप्पत मोन राखब।''
ओ मनुक्ख बनल परेत बताह जकाँ नाचए लागल आ खुनाओल जाइत पोखरि दिस दौड़ल। पोखरिक मोहारपर पहुँचल आ' चिकड ए लागल- ''घुरि आउ कमला... घुरि आउ कमला...।'' आ फेर भोकाडि पाडि कानए लागल। बड ी काल धरि कनैत रहल आ फेर एक उझुक डाकनि देलक- ''नै अएबें ते' हमहूँ कहियो ने तकबौ कहियो नै।''
मोहारपर भीड लागि गेल। लोक ओकरा निछट्ट बताह बूझि रहल छल। थोड बे कालमे लोक देखलक जे पोखरिक बीचमे नीचा सँ पानिक बमकोला छुटलै आ देखिते देखित आधा पोखरि पानि सँ भरि गेल। संगहि लोक देखलक जे ओ बतहा दौड ल दौड ल गेल आ ओहि पानिमे कूदि गेल। ओ ओतहि सँ चिचिआए- ''लागल धुरि अएलीह कमला!!''
                         www.mahavirmandirpatna.org/prakashan/ebook/bhavanath                                                       

शनिवार, 28 अगस्त 2010

मंगलेश डबराल की कविता

 इन ढलानों पर
इन ढलानों पर वसंत आएगा
हमारी स्मृति में
ठंड से मरी हुई इच्छाओं को
फिर से जीवित करता
धीमे-धीमे धुन्धुवाता खाली कोटरों में
घाटी की घास फैलती रहेगी रात को
ढलानों से मुसाफिर की तरह
गुजरता रहेगा अंधकार
चारों ओर पत्थरों में दबा हुआ मुख
फिर से उभरेगा झांकेगा कभी
किसी दरार से अचानक
पिघल जायेगा जैसे बीते साल की बर्फ
शिखरों से टूटते आयेंगे फूल
अंतहीन आलिंगनों के बीच एक आवाज
छटपटाती रहेगी
चिड़िया की तरह लहूलुहान 

श्रोत : फेसबुक

बुधवार, 25 अगस्त 2010

भवनाथ झा की मैथिली कहानी

                                                                                संवेदना

                                                                                                                                               - भवनाथ झा
लगभग बीस वर्षक शोधक उपरान्त डा० सिन्हाकें मनुक्खक मस्तिष्कमे संवेदनाक भौतिक आ रासायनिक संरचनाक पता लागि गेल रहनि। स्कैनिंश मशीन, कम्प्यूटर अल्ट्रासाउण्ड, एकर सभक विकासक बाद एहि क्षेत्रमे शोधमे बड़ सहायता भेल छलनि आ एकैसम शताब्दीमे ओ निश्चित रूपसँ खोज कए नेने छलाह जे मानवक कपारक सामने सेरीव्रमवला भागमे एकटा गट्‌ढा छैक जाहिमे न्यूरॉन कोशिकाक एक समूह जखनि एकटा विशेष तरल पदार्थसँ भीजैत अछि, तखनि ओकरामे संवेदना जन्म लैत छैक।
डा० सिन्हा वैज्ञानिक छथि। हुनक प्रयोगशाला अमेरिकामे छनि जतए सभ तरह सुविधा छनि, राजकीय सहयोग छनि, संरक्षण छनि। अनेक सहयोगी छथिन। विज्ञानक विभिन्न शाखाक अधिकारी विद्वान्‌ हुनक एहि उपयोगी शोधसँ जुड ल छथि। अधिक काल ओहि प्रयोगशालाक सभागारमे संगोष्ठी भेल करै-ए। शोधक बीचमे आएल कोनो बाधापर विचार, विभिन्न शाखाक विद्वानक मन्तव्य, शोधक प्रगतिपर प्रतिवेदन आदि ले' ई संगोष्ठी सप्ताहमे कम सँ कम एक दिन होइते रहैए, मुदा आजुक गोष्ठी एकटा विशेष समस्याक समाधान कतबा ले' राखल गेल छल।
बात ई भेल रहै जे एक इन्टरनेट पत्रिका डा० सिन्हा शोधकार्यक संबंधमे लम्बा-चौड़ा टिप्पणी कएने रहय जे संवेदना जे कि बेकार वस्तु थिक, ओकर भौतिक आ रासायनिक संरचना पर शोध करबा ले' लाखो डालर रुपया पानि जकाँ बहाओल जा रहल अछि। संवेदना एकटा व्यसन थिक, जे विकासमे बाधक अछि। संवेदना एकटा जंजाल थिक, जकर बन्धन कटलाक बादे के ओ चिडै जकाँ उन्मुक्त आकाश में उडि. पाओत। तें एहन विषय पर शोध तत्काल बंद कएल जाए। इंटरनेट पत्रिकाक एहि टिप्पणी पर विभिन्न देश सँ सहमति ई-मेल सँ आएल रहैक आ तें अमेरिका सरकार डा० सिन्हा सँ हुनक मन्तव्य मँगने रहनि।
सभागार खचाखच भरल छल। एल०सी०डी० स्क्रीन डा० सिन्हाक लैपटॉपसँ जोड ल रहए जाहिपर मानव मस्तिष्कक संवेदनाक स्थानक चित्र चमकि रहल छल।
डा० सिन्हा बीज भाषणमे सोझे अपन शोधक उपयोगिता पर अएलाह- ''मानव जाहि गति सँ विकास कए रहल अछि, ओकरा देखैत कहल जा सकै-ए जे ओ सुपरमैनक रूप में बदलि जाएत आ ओकरामे बाँकी तँ सभ किछु मानवे जकाँ रहतैक केवल संवेदना नै रहतै। आ फेर ओ अतिमानव संवेदनाक खोजमे अपन समस्त उर्जा झोंकि देत। तें हम एहि संवेदनाक रासायनिक आ भौतिक संरचनाक खोज कए ओहि अतिमानवक पीढ ीके दिय चाहैत छी जे भविष्यमे मानवीय संवेदनाक ओ रसायन प्रयोगशाला मे बनाए लेतैक।'
एहि बीज भाषण पर मत-मतान्तर उपस्थित भेल। केओ एकर नैतिक पक्ष पर प्रश्न उठाओल तँ केओ कहलनि जे एके कालमे मानव आ अतिमानव दुनूक पीढ़ी आस्तित्वमे रहत तें ओ दुनू एक दोसरा सँ तालमेल कए अपन विकास कए लेत। एही मत मतान्तरक बीच एकटा वैज्ञानिक जे अपन मन्तव्य देलनि ओ डा० सिन्हाकें छू देलकनि। ओ कहने रहथिन जे मानव आ अतिमानव एक सँगे अस्तित्वमे नै रहि सकत, जेना बाघ बिलाडि के देखिते खा जाइत अछि, तहिना ओ अतिमानव अपन सम्पर्कमे अबिते मानवक अस्तित्व मेटाए देत। दोसर बात ई जे संवेदनाक ओहि रसायनक ततेक जटिल संरचना अछि जकरा लैबमे बनाओल नै जा सकत आ जँ बनियो जाएत तँ ओकर सफलताक जाँच केना होएत, किएक तँ मानवीय संवेदनाक एकोटा नमूना रहबे नै करतै। तें एना कएल जाए जे मनुष्यसँ भिन्न कोनो प्राणीमे एहि संवेदनाक रसायन सुरक्षित कएल जाए, जाहि सँ ओ अतिमानव ओहि प्राणीसँ ओ रसायन शल्य-क्रिया द्वारा लए लेताह। एहि प्रकारें मानवीय संवेदना सुरक्षित रहत।''
डा० सिन्हा अपन आवास पर घुरलाह। तावत बेसी राति भए गेल रहैक। सभ सूति रहल छलनि। कॉल कएलनि तँ नोकर आँखि मीड ैत गेट खोलि देलकनि डा० सिन्हा अपन कोठली दिस बढलाह। नोकर के सूति रहबा ले' कहि क'। भोजन करैत काल आ निर्णय लेलनि जे एहन जानवरक खोज कएल जाए जकरामे संवेदना नहि रहैक आ ओकरा पर एहि रसायनक प्रयोग कएल जाए।
हुनक नींद बिला गेल रहनि। रातुक बारह बाजि रहल छलैक तैयो एखनि काज आगाँ बढ़एबाले' ओ उत्सहित छलाह। सभसँ पहिने ओ ई देखए चाहैत छलाह जे कोन परिस्थिति में मानव संवेदना के छोडि दैत अछि। डा० सिन्हा लैपटॉप खोललनि आ इंटरनेट पर 'संवेदनहीनता' शब्द लीखि सर्च करए लगलाह। सर्चइंजन दस हजार रिजल्ट देलनि आ तकर बादो बहुत सर्च बाँकिए छलैक।
ऊपर सँ किछु पेज खोललनि। पहिल पृष्ठ छल नेताक संवेदनहीनता, जे बाढि मे भसिआइत जनताक लेल किछु नै कएने रहथि। दोसर पृष्ठपर एकटा गरीब बाप द्वारा बेटीक हत्या कए देबाक घटना छल, जाहि में संवेदनहीनता शब्द रहैक। तेसर पेजपर एकटा घटनाक समाचार रहैक जे स्कूल जाइत काल एकटा बच्चा सड क कातक नालामे गरदनि धरि फँसल दू घंटा तक चिचिआइत रहल, मुदा केओ ओकरा निकालक नै। चारिम पेजपर गर्भस्थ कन्याक हत्याक समाचार छल। डा० सिन्हा एहि रिजल्टक सभ पृष्ठकें देखब जरूरी बुझएलनि तें ओ अपन एकटा सहयोगीकें सभटा पेज डाउनलोड करबाक आदेश ई-मेल सँ दए सूति रहलाह।
संसार भरिमे जे समाचार छपल छलैक, आ जे किताब, ब्लॉग सभ लिखाएल छलैक आ ओहिमे जत' जत' संवेदनहीनता शब्द छलैक, ओकर सर्वेक्षण आ निष्कर्ष डा. सिन्हा कें चौका देलकनि। ओ एहि सँ निष्कर्ष निकाललनि जे जे मनुक्ख विकास करए चाहैत अछि, ओकरा भोर सँ आधा राति धरि खटए पड' छैक आ तें ओकर संवेदना बिला रहलैए। एकर विपरीत बहुत मानव एहन अछि, जकरा कोनो तरहक अभाव संवेदनहीन बना रहलैए।
तखनि डा. सिन्हा शोधक आरम्भिक चरणमे वरद, गदहा आ वानर एहि तीन स्पेसीजके चुनलनि। वरद खटैनीक साकार मूर्ति थिक। भोरे सँ ओकरो खेतमे, गाड़ीमे, कोल्हुमे जोति देल जाइत छैक। डा. सिन्हाकें पूरा भरोस छलनि जे जँ खटैनी सँ संवेदना बिलाइत अछि तँ वरदमे संवेदना नहिंए होएत। गदहा सेहो एही कोटिमे अछि। धोबीक कपड ा उघैए, जाँत-सिलौट लदने दुआरिए दुआरि घुमैए आ पैघ-पैघ शहरमे जतए गलीमे कोनो गाड ी नै जा पबैत छै, ओतए गदहे सँ ईटा, बालू, गिट्टी, सीमेंट आ घर भरबा ले' माँटि उघाओल जाइत अछि तें खटैनी क कारणे गदहा में तँ संवेदना नहिए होएत।
आ जँ अभावक कारणें संवेदना बिलाइत अछि, तँ वानर अवश्य संवेदनाशून्य होएत। वानरके ने तँ घर छैक आ ने खेत, ने ओ मांसभक्षी थिक, जे कतहु ककरो हत्या कए भूख मेटाए लेत। गाछपर रहैत अछि; फल खाइत अछि। जंगलो तँ धीरे धीरे कटाइए रहलै-ए। तखनि तँ अबस्से वानरमे संवेदना नहि होएत।
डा. सिन्हा एहि तीनू स्पेसीजपर अध्ययन करबा ले' देश-विदेश अनेक वैज्ञानिकके ई-मेल कएलनि आ ओकर रिजल्ट अएबा धरि अपनहु गाम घुरि अएबाक कार्यक्रम बनबए लगलाह। आ अपन एकटा सहयोगी पर प्रयोगशालाक भार दए दोसरे दिन पत्नी आ नोकरक संग स्वदेश विदा भए गेलाह।
हुनक गाममे माता-पिता रहैत छथिन। पर्याप्त खेत छनि। पुरना बँगला छनि। दूरा पर दू जोड ा वरद, गाय, मँहीस छनि। सभटा पर नोकर-चाकर लागल रहै छनि। पाँच किलो चाउर एक साँझ में सीझैत छनि। ओ गाम पहुँचलाह तँ उत्सव मनाओल गेल; भरि गामके नोंतल गेल। बाप-माय कें तँ जेना धरती पर पयरे नै पडि रहल छलनि।
ओहो विदेश सँ आएल रहथि; नोकर सभ इनामक लोभमे हिनके आगु-पाछु करय। प्रात भेने इहो सभकें बजाए इनाम बाँटए लगलाह तँ कपड ा धोनिहार फेकनाकें नहि देखलनि। फेकनाकें ओ बच्चहि सँ देखैत रहथि तें खोज कएलनि तँ सभ नोकर सकुचाए लागल। एकटा नोकर दम साधि क' बाजल - ''निकालि देल गेलै, मालिक।''
- ''किए?''
- ''मालिकक कुरतामे एकटा नमड़ी रहि गेल छलै, जे ओ कपडा खीचैत काल चोराए लेलक।''
- ''नै, नै, मालिक!'' दोसर एकटा नोकर कहलकनि।
- ''तखनि किए निकालि देल गेलै?''
कातेमे डा. सिन्हाक पिता छलथिन्ह। ओएह कहए लगलखिन्ह- ''करीब छओ मास पहिने अपन वरदक घरमे एक राति आगि लागि गेल, जे एके बेर बेसम्हार भए गेलै। फेकना दलान पर सुतल रहए। ओ सोझे वरदक घर ढुकि गेल आ सभटा वरदक डोरी खोलि बैलाए देलेकै। मुदा ओकर अभाग देखू जे अपनै लटपटा गेल आ कुट्टीकटा पर खसि पडल। ओकर पयरमे बेसी कटि गेलै। किछ दिन दवाइ कराओल गेलै मुदा ठीक नै भेलै आ एकटा पयर नीक जकाँ बेकार भए गेलै। तखनि ओहि लुल्ह-नाङरके राखि क' की होएते? ओकरा ओना निकालि दितियैक तँ गामक लोक गुटबंदी करितए, तें चोरिक आरोप लगा क' मारि-पीटि बैलाए देलियै।
डा. सिन्हा सिहरि उठलाह। मोन केनादन करए लगलनि तँ एकटा नोकरकें संग कए टहलै ले' बाध दिस निकलि गेलाह। रस्तहिमे फेकन भेटि गेलनि। गदहा पर कपडा लादि ओहो पुरनी पोखरि जा रहल छल। भेंट भेलनि, गप्प भेलनि, तँ डा० सिन्हा इनाम ल' जएबाले' कहि देलखिन। अपने तँ ओ गाममे नै रहै छथि, तें बेसी किछु कहबा सँ पहिने सभसँ विचार क' लिय' चाहैत रहथि।
डा० सिन्हा बाधमे अपन खेत देखलनि, कमलम गाछी देखलनि आ घर घूरि गेलाह। आ दोपहरियामे खा पी क' निश्चिन्त भेलाह। बेरू पहरमे एकटा घटना घटल। सभ सुनलनि जे बथान पर बान्हल चारू वरद बोमिआए रहल अछि। नोकर-चाकरक संग डा० सिन्हा सेहो दलान पर अएलाह तँ दैखैत छथि जे फेकन नादि लग ठाढ़ अछि आ एकटा वरद ओकर कान्ह पर अपन गरदनि देने निष्पन्द अछि। वरदक आँखि मुनाएल छै आ नोर बहि रहल छै। दोसर वरद ओकर पीठ चाटि रहल अछि। बाँकी दुनू सेहो लग अएबाक अथक प्रयास कर रहल अछि।
डा० सिन्हा चोट्टे घूरि घर गेलाह। लैपटॉप खोललनि आ अपन सहयोगी सभके ई-मेल कएल- ''हमर शोध ले' वरदक स्पेसीज उपयोगी नै होएत। अहाँ सभ दोसर कोनो जानवरक खोज करू जकरामे भावना नै रहए।
अहूँ लोकनि जँ जनैत होइ तँ डा० सिन्हाकें सूचित कए दियनि। हुनक ई-मेल आइ०डी० अछि- इनफो एट दी संवेदना डॉट कॉम।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

नए सपने संजोने की मुहिम

रमण कुमार सिंह की कविताएं आम लोगों की कविताएं नहीं, बल्कि आम लागों के बीच की कविताएं हैं. उन्हीं आम लोगों के बीच की कविताएं जो लाखों-करोड़ों लागों की तरह महानगर आते हैं- ढेर सारे सपने लेकर. लेकिन उन्हीं लोगों की तरह उनके सपने भी महानगर की सड़कों पर खो जाते हैं. फिर सामने आती है अपने गॉंव-घर से अलग होने की टीस. उनकी कविताओं में इस टीस को बखूबी महसूस की जा सकती है. वे अपनी टीस को शब्दों में पिरोने में भी कामयाब होते हैं. लेकिन जैसा कि हर कवि को लगता है कि वे कहीं चूक रहे हैं, या फिर अपनी पीड़ा, अपनी तड़प को शब्दों में बांधने में उन्हें सफलता नहीं मिल रही है, रमणजी को भी ऐसा ही लगता है. शायद कवि की यही बेचैनी कवि को उकसाता है- नए शब्दों, बिंबों व प्रतीकों की खोज करने के लिए. रमणजी इस खोज में लगे रहते हैं लेकिन उन्हें तसल्ली नहीं मिलती. इसीलिए वे कबीर से यह कह कर माफ़ी मांगते हैं कि उलटबांसी तो मेरे समय में भी है लेकिन इसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास तुन्हारी तरह शब्द नहीं हैं. यही कारण है कि वे मैथिली कविताओं में ऐसे शब्द व मुहावरे का प्रयोग करते हैं, जिसका जोड़ हिंदी में मिलना कठिन होता है. वे उन रचनाकारों में से नहीं हैं जो एक भाषा में कमजोर व एक भाषा में बेहतर रचना करते हैं. उनकी हिंदी और मैथिली की कविताओं में वही टीस, वही बेचैनी मिलती है. चाहे वह ओल्डहोम में वृद्ध हो या चौराहे पर खड़ी लड़की हो, या फिर अनुज से संवाद. उनकी कविताओं में गौर करने लायक बात यह भी है कि वे पाठकों को सिर्फ निराशा की ओर नहीं धकेलते, बल्कि तमाम निराशाओं के बाद उन्हें आशा के नव-पल्लव से भी परिचय करते हैं. क्योंकि कोसी- कमला वालों के सपने हर बाढ़ में बह जाते हैं और हर बाढ़ के बाद शुरू होती है फिर से नए सपने संजोने की मुहिम. बहते हुए सपनों के बीच पेड़ की फुनगी पर बचा रहता है नव-पल्लव.
                                                                                                              -सच्चिदानंद

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

रमण कुमार सिंह की मैथिली कविताएं

नीम अँधेरे में जुगनुओं की तरह चमकती कविताएँ 

रमण कुमार सिंह की कविताएँ छोटी छोटी बातों से बहुत ही बड़ी बातें कहती है.  तिनकों 
को जोड़कर सुख का घर बनाने का हठयोग कोसी-कमला वालों से ज्यादा कौन जान सकता है. रमण कुमार सिंह मेरे विचार से किसी चीज को सैलानी की तरह नहीं देखते हैं. यही उनकी कविता की ताकत है और यही कविताई को बचाए रखेगी. इनकी कविता पर फिर कभी... अभी उनकी कविता ही आपके सामने है.  -कुमार राहुल 




ओल्डहोम में वृद्ध
जबकि सेवानिवृत्ति के बाद लोग रह सकते हैं
आराम से अपने परिजनों के साथ
ओल्डहोम में बैठा एक वृद्ध
सोचता है दुनिया की घृणा व प्रेम
यह कोठरी एक बोधिवृक्ष
जहाँ वह पता है जिन्दगी की निस्सारता का ज्ञान
थके-हारे सपने
नाच रहे हैं उसकी बुढी आँखों में
इस शहर में जीने वाले लोग
नहीं समझ सकते उसकी अनिन्द्रा का कारण
आज-कल उसका मन कागज की नाव की तरह
डूबता-उतराता रहता है
एक क्षीणकाय धार में
सुख-दुःख खोया-पाया कुचक्र-यंत्रणा, नाच-गान
हर बातें याद आती रहती हैं उसे
जिन्दगी के छोटे-छोटे खण्डों में
कितने रूप कितने रंगों में
और वह बहते लगता है
वह सोचता है प्रेम
जो नहीं कर सका जिन्दगी भर
वह सोचता है कर्तव्य
जिसे पूरा करने के बाद भी मिली  उसे उपेक्षा
वह सोचता है संगी-साथी, परिवार, संबंध-बंध
जिससे मिला उसे सिर्फ दुःख
उसे होती है ग्लानि
जिन्दगी में की गयी किसी गलती पर
कभी-कभार पूछता है वह अपने से ही
आखिर क्या है यह जिन्दगी?
हरदम आग की धार को पर करना है
या बचपन का पतंग लूटने का है कौशल
या की है यह गीत-
जो कभी चढ़ नहीं सका कभी लय पर
या की नाटक है
जिसका पटाक्षेप होता है दुखांत
क्या है यह जिन्दगी?
किशोर वयस का प्रेम या क़ि प्रौढ़ वयस की कर्तव्यपरायणता
या क़ि दीनता के रेगिस्तान में तपती रेत पर चलना
या क़ि समृधि के रंगीन कुहासे में खोना है जिन्दगी ?
सारी स्मृति गडमड हो रही है
और वह हरदम करता रहता है
अपने ही संतती के तीर से घायल भीष्म की तरह
आजकल वह मृत्यु  की प्रतीक्षा
लेकिन मृत्यु भी है उससे दूर
बहुत दूर....अपने परिजनों की तरह.
अनुज से संवाद
हे हमारे अनुज
हो सके तो क्षमा कर देना मुझे
मैं नहीं सौंप पाया तुम लोगों को रागपुरित पृथ्वी समूची
जो मिली थी मुझे बचपन में
मैं देना चाहता था घर
तुम्हें मिलेगा बाजार
मैं लिखना चाहता था प्रेम
तुम्हें पढने को मिलेगा व्यापर
यह सिर्फ तुम्हारी गलती नहीं होगी
हम लोग घोर अंघेरे समय में जी रहें हैं
हमारे पूर्वज पहले रहते थे जंगल में
एक प्रकाश देख उन्होंने पकड़ी विकास की राह
प्रकाश के पीछे-पीछे भटकने लगा मैं भी
प्रकाश बन गया मृग-मरीचिका और
भटकना बन गया हमारी बीमारी
कभी इसके पास तो कभी उसके पास
भटक रहा हूँ मैं
अपने पास स्थिर कहाँ राह पता हूँ
वह निश्चय ही बेहतर दिन रहे होंगे
जब अपने लोगों के पास स्थिर रहा होऊंगा मैं
आज भटकते-भटकते पहुंच गया हूँ
विश्व ग्राम तलक
यह हमारे पूर्वजों का
वसुधैव कुटुम्बकम का गाँव तो नहीं ही है
ग्लोवल दुनिया का विश्व ग्राम है यह
जहाँ सब चीज है बिकाऊ
बचपन में सूनी थी बाबा की पराती
बाबा के पास थे अलग-अलग समय के लिए
अलग-अलग राग
बाबा कर लेते थे समय से संवाद
बाबा समय को पहचानने के गुर जानते थे
मैं नहीं सीख पाया बाबा से
समय को पहचानने का गुर
और नहीं बचा कर रख पाया बाबा का राग
इस अंघकार समय में अनाथ हो गया हूँ
पथरा गए हैं हमारे शब्द
गूंगा हो गया है हमारा इतिहास
स्मृति को भुलाकर उलझ गया हूँ
भौतिकता की 'अन्हरजाली' में
मैं बढ़ता जा रहा हूँ बुढ़ापा की ओर
तुम लोग हो रहे हो बच्चा से किशोर,
किशोर से युवा
बचा होगा तुम लोगों में कल से संवाद करने का साहस
बुढ़ाई हुई शताब्दी के अवसान के समय में
एक लगभल असफल पीढी का
प्रेम और शुभकामना है तुम्हारे साथ
अपने से चुन लो अपनी दिशा, अपना भविष्य
ऐसे समय में तुम लोग ही गा सकते हो
नए स्वर, नए छंद, नए ताल में
नई सुबह की पराती...
गुमशुदगी रिपोर्ट
राजधानी की इस रोशनी से
नहायी हुई सड़क पर
एक दिन मेरी बेटी की हंसी
पता नहीं कहाँ गुम हो गयी
मेरे गॉंव के रामधन काका के बुढ़ापे की लाठी
इस महानगर की भीड़ में
खो गया महामिहम जी
और अपना हाल क्या कहें 
पता नहीं रत-दिन के इस भागम-भाग और
हड़बड़ी में वे सपने भी खो गए
हे महामिहम जी,
सुनते हैं कि राजधानी की पुलिस
माहिर होती है
मेरे जैसे अदना लोगों की तो बात भी नहीं सुनती है
आप ही ढूंढ निकालिए न
मेरी बेटी की हंसी
रामधन काका के बुढ़ापे की लाठी
और मेरे वे सपने, जिसे लेकर मैं आया था
राजधानी में....
फिर से हरा-भरा
एक वयस्क एकाकीपन से त्रस्त
मैं और आप साथ हुए थे
दुःख, उम्मीद और उत्सव की उस रात
एक दूसरे से अपना-अपना दुःख बांटते हुए
पता नहीं कब कर लिया था निर्णय
कि जब कभी भी कर लेंगे सुख अर्जित
दोनों मिलकर भोगेंगे
सच कहता हूँ मीता
तुम्हारी आँखों में चमकती हुई आकांक्षा देख
मौसम अनायास ही लगने लगा था सुहाना
मेरी सांसों में व्यग्रता और
शब्द में होने लगा था उत्साह का संचार
अहर्निश आप का ही संगीत गूंजता था ह्रदय में
अपने सपने के एकांत संसार में
रचा था एक सुख-संसार
लेकिन यातना व प्रेम की इस कथा का
अंत हुआ था नाउम्मीद के कुहासे में
हर चीजें तोता मैना के किस्से की तरह
व्यर्थ हुआ मीता
किसी कथा का अंत कितना दुखद होता है
सो पता है आपको मीता?
इसके बाद कुछ बांकी नहीं रहता है
निपट रिक्तता और बेमतलब जीवन
अपना मन ही समझा रहा अपने मन को
जीवन को फिर से सुखमय बनाने का जुगाड़
नाउम्मेदी के इस दौर में
कहीं से फूटते हैं उम्मीद के नव-पल्लव
और जिन्दगी होने लगती है
फिर से हरी-भरी.
उलटबांसी
कृषि प्रधान इस देश में
किसान कर रहे हैं आत्महत्या
जनकल्याणकारी राज्य की संसद में
रोज बनते हैं कानून लेकिन
बनिया और विदेशी सौदागरों के लिए
स्कूल-कॉलेजों में चरित्र निर्माण की नहीं
दूसरे की जेब से अपनी जेब में
पैसे झटकने की दी जाती है शिक्षा
न्यालय में अभियुक्त की हैसियत देख कर दिए जाते हैं फैसले
लोकतंत्र का चौथा खम्भा
अपने अस्तित्त्व के के लिए है संघर्षरत
बाबा कबीर!
उलटबांसी आपके ही समय में नहीं
मेरे समय में भी है
लेकिन कहाँ से लाऊं मैं
आप जैसे शब्दों में असर
यह भी एक उलटबांसी है,
माफ़ करना कबीर!
 मैथिली से अनुवाद धर्मेन्द्र झा

रमण कुमार सिंह की हिन्दी कविताएं

बच्चों से हमारी चाहतें
हम अपने बच्चों में बच्चा नहीं
भविष्य का सफल व्यक्ति ढूंढ़ते हैं
हम चाहते हैं कि उनके शिशु-मस्तिष्क
कंप्यूटर जैसे हों तेज़
और हौसले हीलियम भरे गुब्बारे की तरह
इंसानियत के तमाम गुण हों हमारे बच्चे में
और बड़ों का सम्मान तो भगवान की तरह करे वो
हम अपने बच्चे के औसत या फिसड्डी होने की
तो कभी सोच ही नहीं सकते
औसत या फिसड्डी बच्चे हों भी हमारे तो
उसे अपना कहने में भी शरमाते हैं
हम चाहते हैं कि हम जो हासिल न कर पाये
वो सब कुछ हासिल करें हमारे बच्चे
हम चाहते हैं कि वो
कल्पना चावला की तरह प्रसृद्धि पाएं
मगर उनका हश्र कल्पना चावला जैसा न हो
हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे
सुंदर हों और सुशील भी
उनके दिलों में प्यार हो और उमंगें बेशुमार
मगर हमारी पसंद के बिना वो किसी को न करे पसंद
वे बस हमारी उम्मीदों का माइल स्टोन बनें
हम ये भी चाहते हैं कि
लोग उन्हें मेरे परिचय से नहीं
बल्कि उनके परिचय से हमें जानें
अपने बच्चों को लेकर हमारे मन में
अनंत चाहतें होती हैं
हम चाहते हैं वो ये करे
वो वह करे
सब कुछ करे
लेकिन
अपने मन की न करे...
चौराहे पर लड़की
अपनी चिर-पुरातन पोपली आत्मा और
दादी-नानी द्वारा मिली नसीहतों का कवच उतार
चौराहे पर थी खड़ी लड़की अकेली
उसके आंचल में कुछ फूल थे सूखे हुए
मन में थीं कुछ दबी भावनाएं
कंठ में कोई गीत था उसके
जिसे वह रह-रह कर
गुनगुना उठती थी
आसपास खड़े लोगों में उसको लेकर
कुछ फुसफुसाहटें थीं कुछ जुगुप्सा
- किसकी बेटी है... किसकी पत्नी...
- चीज़ बड़ी ऊंची लगती है...
- हां मगरूर भी...
- कर रही होगी किसी का इंतजार
लोगों के मन में बहुत कुछ है
इस लड़की के विषय में
सिवा किसी सम्मानजनक भाव के
इन सबसे बेपरवाह लड़की
अपने में ही मगन
दृढ़ता से खड़ी है
अकेली
चौराहे पर
माफ़ करना मिता
मैं तुम्हें सोते हुए छोड़कर जा रहा हूं
हालांकि सोते हुओं को बिना जगाये
छोड़कर निकल जाना ठीक नहीं है
मगर माफ़ करना मिता
मैं तुम्हें सोते हुए छोड़कर जा रहा हूं
इतिहास में लांछित है गौतम बुद्ध
यशोधरा और राहुल को
सोते हुए छोड़कर जाने के लिए
हालांकि मैं बुद्ध नहीं हूं
हरेक को निकलना पड़ता है अकेले ही
अकेले ही भोगना होता है भटकाव
जब तुम जगोगी तो तुम्हें यह दुनिया
कुछ बदली-बदली नजर आएगी
आज का समय वही नहीं होगा
जो कल का था
और न ही आज का दुख
कल का दुख होगा
न आज का चुंबन वह होगा
और न आज के आलिंगन में वो खिंचाव
जो कल था
सब कुछ एकदम नया-नया होगा
एक नई शुरुआत के लिए आमंत्रण देता हुआ

संपर्क-द्वारा-पंकज बिष्ट
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मंगलवार, 10 अगस्त 2010

कविताएँ जो बोलती हैं 6

साभार रवि कुमार

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कविताएँ जो बोलती हैं

सावन में रूठा बदरा, धरती की फटी बिवाई

देश के कई हिस्सों में बाढ़ आयी है लेकिन झारखंड सूखा की चपेट में है. गोड्डा जिले में जमीन में दरारें पड़ गयी है. किसानों के सामने विकट स्थिति है. निरभ किशोर और अविनाश कुमार की रिपोर्ट.
आधा सावन बीत जाने के बाद भी रूठे बादलों को किसानों पर जहां नहीं आया. सावन में जेठ सा नजारा. जमीन में दरारें पर गयी हैं, मानों धरती मैया की बिवाई फट गयी हो. आसमान में बादल उमरते - घुमरते हैं. गरजते भी. लेकिन बरसते नहीं. अगर बरसते भी हैं तो दो-चार बूँद ही. इन दो-चार बूंदों से क्या होगा. गर्म तवे पर जैसे दो-चार बूँदें छन् से रह जाती हैं, उसी तरह बारिश की दो-चार बूँदें जमीन पर छन्न से रह जाती हैं. न जाने कौन सी हवा बहती है, जो सिर्फ बादल को नहीं,  बल्कि किसानों की उम्मीदों को भी उड़ा ले जाती हैं.
आषाढ़ की दो-चार दिनों की बारिश के बाद रूठा बदरा लाख कोशिशों के बाद भी मानने का नाम नहीं ले रहा. आषाढ़ में थोड़ी सी रोपनी ही पाई थी, वे विचड़े भी अब सूख गए हैं. अब तक १०-१५ प्रतिशत रोपनी ही पाई है. गोड्डा के किसान बताते हैं कि ०९ में भी ऐसा समय नहीं आया था. बिचड़े को बचने के लिए किसान कड़ी मशक्कत कर रहे हैं लेकिन इन बिचडों को बचाने के लिए पैसे चाहिए. लगातार दो वर्षों से सुखाड़ का दंश झेल रहे ये किसान आखिर रूपये कहाँ से लायेंगे. अगस्त में जिले में महज तीन एम-एम बारिश ही हुई है.
विभाग ने की झूठी रिपोर्ट
गोड्डा जिले के किसान कृषि विभाग की रिपोर्ट से आक्रोशित हैं. जुलाई में विभाग ने २५० एम.एम बारिश दिखाया है. यह रिपोर्ट डीसी के माध्यम से स्टेट को भेजी गयी है. जबकि किसानों का कहना है क़ि गत माह महज १५० एम.एम बारिश ही हो पाई है. बारिश का आलम यह है क़ि कुएं का जलस्तर एक फुट भी ऊपर नहीं आ पाया है. वहीँ विभाग ने घनरोपनी का प्रतिशत ३० बताया गया है जबकि १५ फीसदी रोपनी भी ठीक से नहीं हो पाई है.